कामिनी की कामुक गाथा (भाग 73)

पिछली कड़ी में आपलोगों नें पढ़ा कि किस तरह मैं अपनी कामक्षुधा में अंधी हो कर एक खुराफाती फैसला ले बैठी। अपने तन की वासना पूर्ति हेतु नित नये रोमांचक, जोखिम भरे अन्वेषण के क्रम में अपने नये भवन के निर्माण कार्य में लगे कामगरों से संसर्ग की घृणित मनोकामना के वशीभूत खुद को परोस देने का मन बना बैठी। जोखिम भरे ऐसे रोमांचक तरीके इजाद करके अपनी वासना की भूख मिटाना मेरी फितरत बन चुकी थी और इसमें मुझे एक अलग तरह का आनंद प्राप्त होता था। इसे संयोग कहें या ऊपरवाले की योजना, पहले मिस्त्री सलीम के सम्मुख गोदाम में समर्पण कर बैठी, फिर उसके सहयोगी तीन मिस्त्रियों के संग पुनः उसी गोदाम के गंदे स्थल में अपने तन को निहायत ही निकृष्ट ढंग से नुचवा बैठी। इतने से ही मन न भरा हो जैसे, सलीम और उसके सहयोगी मिस्त्रियों के घृणित प्रस्ताव, कि बाकी मजदूरों संग भी रंगरेलियां मना लूं, स्वीकार बैठी। वैसे भी सब मजदूर एक से एक कसरती शरीर वाले, खासकर छ: फुटा, हट्ठा कट्ठा मंगरू, सोच कर ही रोमांंचित हो उठी। बाकी कामगरों संग भी वासना का घृणास्पद खेल खेलने की तीव्र इच्छा मन के अंदर कुलांचे भरने लगी। अंततः शैतान जीत गया। दूसरे ही दिन, रविवार, छुट्टी का दिन, सबको आमंत्रित कर बैठी। योजनाबध्द तरीके से सब व्यवस्था हो गया। घर के तीनों पुरुषों को ऊपरवाले नें खुद ही गायब करके मुझे खुली छूट दे दी। जा, जो मर्जी कर, बन जा छिनाल। बस ऊखल में सिर डाल बैठी। पहचान गुप्त रख कर सामान्य से भी निचले वर्ग की स्त्री का रूप धर कर उन वासना केे खिलाड़ी कामगरों के समूह के सम्म्मुख प्रस्तुत हुई।

आगे जो होना था उसकी कमान सलीम मिस्त्री के हाथों में थी। ताश के पत्तों की सहायता से सबको गुलाम और बादशाह में तब्दील करके वासना का नंगा नाच करने के लिए छोड़ दिया। मैं नादान बनी उस खेल में शरीक हुई और उन सबके हाथों की कठपुतली बन गयी। परिणाम यह हुआ कि विरोध का दिखावा करते करते हरेक उपस्थित कामुक भेड़ियों का शिकार बनती चली गयी। कुल मिला कर सात लोगों नें मेरे साथ बारी बारी से संभोग किया। अब वे घटिया लोग, जिनकी नजरों में स्त्री एक भोग्या के अतिरिक्त और कुछ नहीं थी, एक एक करके मेरे जिस्म का मनमाफिक ढंग से रसपान करते गये और मुझे अधमरी करके रख दिया। उन्हें क्या पता था कि जिसे एक गंदी देहातिन समझ कर अपनी कामुकता का शिकार बना रहे हैं वह दरअसल उस घर की मालकिन है। अच्छा ही था, इस तरह वे खुल कर मेरे साथ बदतमीजी से पेश आ रहे थे, खुल कर मेरे साथ मनोनुकूल व्यवहार कर रहे थे, वरना शायद मैं उस रोमांचक आनंद से वंचित रह जाती। उन अनपढ़ गंवार लोगों की वहशियाना नोच खसोट और बलात्कार सरीखे संभोग में पीड़ामय आनंद पा कर निहाल हो उठी। उस वासना के तूफान के शांत होते होते मैं अर्धमूर्छित अवस्था में पहुंच गयी थी, लेकिन किसी प्रकार खुद को संभालने में सक्षम हो गयी।

अपने को पूर्णतः लुटा कर अंत में मैंने अपनी पहचान पर से पर्दा हटा दिया। सुनकर एकाएक वे सन्न रह गये, लेकिन यह समझ कर कि यह सबकुछ मेरी खुद की मर्जी से हुआ है, प्रसन्नता के मारे खिल उठे। अब हमारे बीच कोई बड़े छोटे का दीवार नहीं था। अब देखिए, हम सब बेशरमों की तरह बिल्कुल नंगे, खाना खाने में लीन थे। खाना खाते खाते, सलीम बोला, “तो मैडम…..”

“न न न मैडम नहीं।” मैं बीच में ही बात काट बैठी।

“अच्छा, कामिनी जी।”

“नहीं, ‘जी’ नहीं।”

“अच्छा, कामिनी।”

“नहीं, कामिनी नहीं।”

“फिर?”

“चांदनी।” मैं बोली।

“नहीं।” बोदरा बोला, शैतानी उसकी आंखों में नाच रही थी।

“फिर?” मैं सशंकित हुई।

“चोदनी।” बोदरा बोला। सभी ठठाकर हंस उठे। हंसते हुए कांता और सोमरी की चूचियां हिल रहे थे। मैं हंस पड़ी।             “ठीक है, आज से मैं तुम लोगों की चोदनी।” मैं सहमत थी अपने नये नामकरण पर। “अरे तुमलोग भी कुछ बोलो ना। खुल के बोलो। जो मन में है बोल डालो।” कांता और सोमरी की ओर देखती हुई बोली।

“का बोलें? चोदनी कहीं की।” मेरी असलियत जानकर झेंपती, वाचाल कांता का अब मुह खुला।

“हां, ये हुई न बात।”

“लंडखोर।” अब सोमरी का भी मुंह खुला।

“कुत्ती, बुरचोदी।” अब कांता बिंदास हो गयी।

“और ये हरामजादे कौन हैं?” मैं मर्दों को दिखा कर हंसते हुए पूछी।

“ई सब कुत्ते हैं, औरतखोर कुत्ते। औरत देखा नहीं कि लंड खड़ा, सब के सब मादरचोद एक नंबर के।” अब सोमरी भी रंग में आ गयी।

“अच्छा यह बताओ, तुम सब एक तरह के लोग इस ठेकेदार के हाथ कैसे लगे?” मैं पूछ बैठी।

“ई हम बताएंगे, लेकिन खाना खाने के बाद।” इतनी देर से चुप गांडू मुंडू बोला। इसी तरह चुहलबाजी करते हुए हमने खाना खाया। खाना खाने के बाद हम सब उसी तरह नंगे बैठ गये ड्राईंग रूम में। मैंने ही मना किया था कपड़े पहनने से। ऐसा लग रहा था मानों हम सब सभ्यता से कोसों दूर आदिम युग के मानव हों। पुरुषों की नजरें हम स्त्रियों की नग्न देह पर, खास कर यौनांगों पर ही चिपकी थीं। उसी प्रकार हम स्त्रियों की नजरें भी पुरुषों की नग्न देह पर, खासकर उनके यौनांगों पर जमी हुई थीं। स्पष्ट था कि कुछ विश्राम के पश्चात हम फिर गुत्थमगुत्था होने वाले थे। लेकिन अब कुछ हद तक कमान अब मेरे हाथों में थी। कुछ हद तक का मतलब यह था कि उनकी स्वतंत्रता मैं भी हनन नहीं करना चाहती थी वरना मैं अपने मकसद से शायद कुछ दूर ही रह जाती।

“हां, तो मुंडू, अब बोल, क्या बोल रहा था।” मैंने बात शुरू की।

“क्या बोल रहा था?”

“वही, तुम सब, एक जैसे कमीनों का समूह कैसे बना?”

“ओह, वह बात? तो सुनिए।”

“‘सुनिए’ नहीं, ‘सुन’।” मैं तत्काल बोली।

“अच्छा बाबा सुन। सबसे पहले हम मंगरू से मिले। यह आज से करीब दस साल पहले का बात है।”

“नहीं, एकदम शुरू से।”

“क्या मतलब?”

“मतलब, जब से तुझे गांड़ मरवाने की आदत लगी, तब से।” मैं बीच बोली और सभी हंस पड़े।

“हां हां, वहां से, वहां से।” सब एक स्वर में बोल उठे। एक पल को मुंडू रुका। फिर बोलने लगा:-

“ई सब शुरू हुआ स्कूल समय से। बीस साल पहले से। तब हम दसवीं में पढ़ते थे। हम क्लास में सबसे सुंदर थे। सब दोस्त हमको छेड़ते थे, मेरा छाती दबा देते थे, मेरा गांड़ दबा देते थे, मेरा गाल नोच लेते थे। हमको बहुत शरम लगता था लेकिन अच्छा भी लगता था। हमको लड़की लोगों के साथ खेलना अच्छा लगता था। हमारे क्लास में एक लड़का था रोहित। पढ़ने लिखने में एक नंबर का फंटूश। वह हम सबसे उमर में बड़ा था लेकिन एक नंबर का बदमाश था। नौवीं में फेल हुआ, फिर दसवीं में दो बार फेल होकर हमारे ही क्लास में था। हम उस समय पंद्रह साल के थे और रोहित करीब अठारह साल का था। वह हमेशा ही मेरे पीछे पड़ा रहता था।वह हम सबसे बहुत ज्यादा चलाक और गंदा था। गंदा गंदा किताब रखता था अपने पास।”

“गंदा किताब मतलब?” मैं पूछी।

“गंदा किताब मतलब औरत मरद का चोदा चोदी वाला कहानी किताब, फोटो वाला।”

“अच्छा, फिर?” हमारी उत्सुकता बढ़ गयी।

“हमारा घर स्कूल से ज्यादा दूर नहीं था। हम पैदल ही स्कूल जाते थे। एक दिन शाम को स्कूल से छुट्टी के बाद घर लौट रहे थे तो रोहित भी मेरे पीछे पीछे आ गया। स्कूल और घर के बीच एक बहुत पुराना बड़ा सा टूटा फूटा खंडहर था। जैसे ही हम उस खंडहर के पास से गुजरने लगे, रोहित पीछे से मेरे पास आया और बोला, “अरे कैलाश, रुक न।”

“काहे?” मैं बोला।

“चल तुझे एक चीज दिखाते हैं।” वह बोला। हम उससे पीछा छुड़ाना चाहते थे, इसलिए रुके नहीं। वह मेरी बांह पकड़ कर उस खंडहर की ओर ले चला।

“नहीं, हम घर जाएंगे।” मैं उसके हाथ से छूटने की कोशिश करने लगा। लेकिन वह हमसे दुगना ताकतवर था। हमें करीब करीब घसीट कर खंडहर में ले आया।

“चल बैठ यहां।” एक चबूतरे पर जबर्दस्ती बैठा दिया।

“नहीं हम जाएंगे।”

“अरे चले जाना, जरा बैठ तो।”

“जल्दी दिखाओ, क्या दिखाना है।” हम पीछा छुड़ाना चाहते थे।

वह अपना स्कूल बैग खोला और उसमें से एक किताब निकाला और हमें देते हुए बोला, “ले देख।” हम उसके हाथ से किताब लेकर जैसे ही पहला पन्ना खोले, देख कर शरम से पानी पानी हो गये। दो आदमी नंगे थे और एक दूसरे को चूम रहे थे।

“यह क्या है?” हम बोले।

“अरे आगे तो देख।” वह बोला। हम अगला पन्ना खोले। उसमें एक आदमी दूसरे आदमी का नुनु चूस रहा था।

“नुनू क्या?” मुझे और सभी को मजा आ रहा था।

“नुनू मतलब लौड़ा।” मुंडू बोला।

“ठीक है आगे बोलो।”

उस फोटो को देख कर हम बोले “छि:”, जबकि हमें देखने में मजा आ रहा था।

“छि: क्या, आगे तो देख।” कहते हुए रोहित मेरे बगल में बैठ गया। हमने अगला पन्ना खोला तो मेरा मुंह खुला का खुला रह गया। इसमें उनके लौड़े बड़े बड़े और खड़े थे, दोनों एक दूसरे के लौड़ों को पकड़े हुए थे। हमारे सारे शरीर मेंं सुरसुरी होने लगी। हमें शरम भी आ रहा थी।

“आगे देख।” रोहित बोला और पन्ना पलट दिया। हे भगवान, यहां देखा तो एक आदमी एक लड़के को गोद में उठा कर उसकी गांड़ में लौड़ा डाला हुआ था। हम आंखें फाड़े देखते रह गये। वह छोटा सा, करीब हमारी उमर का ही लड़का था, जिसकी गांड़ में एक पचास साठ साल के बुड्ढे का लंड घुसा हुआ था। उस लड़के को वह बूढ़ा चूम रहा था। वह लड़का आंखें बंद किये हुए खुश दिख रहा था। इधर हमें पता नहीं क्या हो रहा था, हम समझ नहीं पा रहे थे। हमारे सारे बदन में चींटियां दौड़ रही थीं। हमनें महसूस किया कि रोहित का दाहिना हाथ मेरी कमर से लिपट गया था और उसने धीरे से मेरा बांया हाथ अपने पैंट के ऊपर से ही ठीक अपने लौड़े के ऊपर रख दिया।

“ई का कर रहे हो?” हम बोले, मगर हाथ नहीं हटाए। हम शरमा रहे थे मगर मना नहीं कर पा रहे थे। ऐसा लग रहा था रोहित नें हमपर जादू कर दिया है और हम उसके काबू में चले गये थे। अब रोहित धीरे धीरे मेरी छाती दबाने लगा। हमें बड़ा अच्छा लग रहा था। वह मेरे गाल को चूमने लगा। हमें यह भी बहुत अच्छा लग रहा था।

“कुछ नहीं पगले, प्यार कर रहे हैं।” वह बोला। हमें लगने लगा कि उसके पैंट के अंदर कोई केला डाला हुआ है जो शुरू में चिनिया केला जैसा था, अब सिंगापुरी केला जैसा हो गया था। अब रोहित धीरे से अपने पैंट का हुक खोल कर चेन खोल दिया। अपने चड्ढी को सरका कर अंदर का सिंगापुरी केला बाहर निकाल लिया। बाप रे बाप, करीब सात इंच का उसका लौड़ा था वह। काला सांप जैसा। टाईट, मोटा सांप। हमारा दिल जोर से धड़कने लगा।

“ले, पकड़ इसे।” उसने मेरा हाथ अपने लौड़े के ऊपर रख दिया। हम तो उसके वश में थे, पकड़ लिए, जैसा वह बोला। बाप रे, कितना गरम था। घबरा कर जैसे ही हाथ हटाए, बोला, “डरो मत, सहलाओ इसको।” वह हमें चूमता जा रहा था और मेरी छाती दबाता जा रहा था। हमेंं बड़ा अच्छा लग रहा था यह सब। जैसा उसने कहा, हम सहलाने लगे उसका लंड। हमपर नशा चढ़ रहा था। अब वह हमारे कपड़े खोलने लगा।

“नननननहींईंईंईं, नननननहींईंईंईं,” बस इतना ही बोले धीरे से। रोके नहीं। रोकने का मन भी नहीं कर रहा था।

“हां हां,” बोलते हुए खोलता चला गया मेरे कपड़े।

“न न न न नहीं।” हम उससे लिपटते हुए, शरमाते हुए बुदबुदाए।

“शरमाओ मत मेरी रानी। खोलने दे। नंगी हो जा। दिखा तो अपना सुंदर बदन। बहुत दिन से तरस रहे हैं तेरे लिए।” वह हमसे इस तरह बात कर रहा था, जैसे कि हम कोई लड़की हैं। वह हमें पूरा नंगा कर दिया। वह किताब न जाने कब मेरे हाथ से छूट कर गिरा नीचे, हमें पता ही नहीं चला। हम लड़कियों के समान शरमा रहे थे। फिर खुद भी एक एक करके अपने कपड़े खोलने लगा और अंत में पूरा नंगा हो गया। हम ठहरे साढ़े चार फुटिये चिकने लड़के और वह पौने छ: फुट का लंबा तगड़ा जवान लड़का। हमारी छाती लड़कियों की तरह ही दिखती थी, जो कि अब भी है। बदन पूरा चिकना, और लौड़ा सिर्फ अढ़ाई इंच का सामने झूल रहा था, बिना झांट वाला। वहीं उसका बदन लंबा तगड़ा, सात इंच लंबा और करीब अढ़ाई इंच मोटा काला लंड सामने उठक बैठक कर रहा था। नाभी और लंड के बीच, और लंड के चारों ओर काले काले बाल भरे हुए थे। बड़े बड़े अंडू लंड के जड़ से नीचे झूल रहे थे। हम देखते रह गये उसका बदन। वह धीरे धीरे हमारेरे पास आया और हमसे सट कर खड़ा हो गया। उसका लंड हमारी नाभी को छू रहा था। हमें जैसे उसनें स्टैचू बना दिया था, ऐसा स्थिर खड़े रह गये थे हम। उसने हमें अपनी बांहों में भर लिया और हमें फिर से चूमने लगा। हम किसी बच्चे की तरह उसकी छाती से चिपक गये थे। हम पिघल रहे थे उसकी बांहों में। हमारी आंखें बंद हो गयी थीं। हमारा हाथ अपने आप उसके लंड पर चला गया और हम सहलाने लगे उसके लंबे मोटे लंड को। यह हमें क्या होता जा रहा था हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह धीरे से हमें अपनी बांहों में समेटे नीचे घास पर लेट गया।

“आई लव यू मेरी जान।” मेरे कान पर बड़े प्यार से बोला। हम तो अब अपने को लड़की ही समझ बैठे थे। आगे क्या होगा इसका अंदाजा भी नहीं था हमको। वह अब हमारे चिकने, गोल गोल गांड़ को सहलाने लगा। हमें बड़ा आनंद आ रहा था। होश ही नहीं था हमको। हमारे गांड़ को धीरे धीरे दबाने लगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” हम सिसक उठे। वह मुझे लिटा कर अब मेरी छाती को चूमने लगा, चूसने लगा। हम पागल होते जा रहे थे। धीरे धीरे वह और नीचे जाने लगा, और नीचे, हमारी नाभी तक चूमता चला गया। और नीचे, और नीचे, हमारे ढाई इंच के लंड तक। हमारे लंड को आईसक्रीम की तरह चूसने लगा, “ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” हम अपने आवाज को रोक नहीं पा रहे थे। इसके बाद वह मुझे धीरे से पलट दिया और हम उसके गुड़िया की तरह पलट गये। अब वह हमारे पीठ पर चूमने लगा, चूमते चूमते नीचे जाने लगा, और नीचे, और नीचे। वह हमारे गांड़ तक पहुंच चुका था। हमारे गांड़ को चूमने लगा, ओह भगवान, ओह भगवान, हम तो हवा में उड़ने लगे। वह हमारे गांड़ के बीच दरार को चाटने लगा। आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, गजब, हम पागल हुए जा रहे थे। वह हमारे गांड़ के छेद में जीभ डाल चुका था और चाट रहा था।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, छि:, वहां नहीं वहां नहीं आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” हम तड़प कर बोले।

“बस बस, यहीं रे पगली, बस, यहीं।” वह चाटता रहा चाटता रहा, हमारे मना करने के बावजूद चाटता रहा और हम अपने आप अपने पैर फैला बैठे। अब वह हमें पलट कर उठा लिया अपनी गोदी में। हम किसी बच्चे की तरह उसकी गोद में थे। हमनें देखा वह मुंह से थूक निकाल कर मेरी गांड़ पर लगा रहा था। फिर और थूक लेकर अपने लंड पर लगा रहा था।

“यह यह क क क क्या कर रहे हो?” हम उसकी बांहों में सिमटे किसी प्रकार बोले।

“कुछ नहीं मेरी रानी, बस अब सबसे मजेदार खेल खेलेंगे।” हमें चूमता हुआ बोला। हमारे सोचने समझने की ताकत खतम हो गई थी। तभी उसनें हमें थोड़ा हवा में उठाया और हमें ऐसा लगा उसका लंड हमारे गांड़ के फांक के बीच फंस रहा है। हे भगवान, तो क्या, तो क्या अब यह हमारे साथ वही करने वाला है जो फोटो में हमनें देखा था। मतलब हमारे गांड़ में अपना लंड घुसाएगा क्या? घबरा गये हम।

“नहीं, नहीं ये मत करो।” हम डर के मारे बोले।

“काहे न करें।”

“ऐसा नहीं हो पाएगा हमसे।”

“काहे नहीं हो पाएगा, मेरी जान। सब हो पाएगा।” वह हमें चूमते चाटते हुए बोला। इससे पहले कि हम और कुछ बोल पाते, उसनें हमें अपने लंड पर बैठाना शुरू कर दिया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं्ई,” उसके लंड का अगला हिस्सा हमारे टाईट गांड़ को चीरता हुआ घुस रहा था और हम दर्द से छटपटाने लगे और चिल्लाने लगे।

“चुप हरामजादी, चिल्लाओगी तो और लोग भी आ जाएंगे। फिर सब तेरी गांड़ चोदना शुरू कर देंगे।” एक थप्पड़ मेरे गाल पर मार कर डरावनी आवाज में बोला। हम डर गये लेकिन दर्द से हमारे आंखों से आंसू निकलने लगे थे। इधर हमारा गांड़ फटता चला गया और उसका उतना लंबा और मोटा लंड घुसता चला गया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, नननननहींईंईंईं, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह फट गया गांड़।” हम रोते हुए बोले।

“कुछ नहीं हुआ, चुप रहो मेरी रानी। अब देखो, पूरा लंड घुस गया। अब तुम्हें मजा आएगा।” हमें बहलाने लगा।

“नहीं नहीं, बहुत दर्द हो रहा है।” हमारे आंख का आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। हम छटपटा कर हटना चाहते थे लेकिन वह बहुत ताकतवर था। हमें हिलने भी नहीं दे रहा था। कुछ देर तक वैसा ही स्थिर रहा। धीरे धीरे हमारे गांड़ का दर्द भी कम होने लगा। ताज्जुब लग रहा था हमको। उसका उतना बड़ा लंड हमारे गांड़ में थंसा हुआ था लेकिन अब दर्द कम हो रहा था। वह एक हाथ से हमारा कमर पकड़ रखा था और दूसरे हाथ से मेरा लंड सहला रहा था। अब हमको अच्छा लग रहा था।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” हम सिसक उठे। वह समझ गया कि अब हमारा दर्द कम हो गया।

वह बड़े प्यार से हमें चूमता हुआ बोला, “ओह मेरी जान, अब ठीक लग रहा है ना?”

“हां, हां, अब ठठठठठीक हहहहैऐऐऐ।” हम शरमा के उसकी छाती पर सिर रख दिए।

“अय हय मेरी प्यारी रानी, ऐसे शरमाओगी तो हम मर ही जाएंगे।” वह मुझे चूमते हुए बोला। अब धीरे धीरे हमें ऊपर उठाने लगा, उसका लंड हमारे गांड़ से बाहर निकल रहा था। वह हमारे लिए एकदम नया अनुभव था। बड़ा अच्छा लग रहा था। अभी उसका लंड पूरा बाहर निकला भी नहीं था कि भचाक से फिर बैठा दिया अपने लंड पर।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” हम चीख पड़े फिर दर्द से। इस बार थोड़ा कम था दर्द। “दर्द हो रहा है आह।”

“बोला न, चिल्ला मत हरामजादी कुतिया।” एक झांपड़ और पड़ा मेरे गाल पर।

“मारो मत ना।” हम फिर रोने लगे।

“ओय ओय मेरी रानी। रो मत मेरी जान।” पुचकारते हुए हमसे बोलने लगा।

“तुम मारते हो तो।”

“अच्छा नहीं मारेंगे।” हमें चूमते हुए बोला। “मगर तुम चिल्लाओगी नहीं अब।” उसकी बातों से हमें थोड़ी राहत मिली।

“अच्छा नहीं चिल्लाएंगे।” हम सिसकते हुए बोले। अब धीरे धीरे वह अपना लंड हमारी गांड़ में अंदर बाहर करने लगा। थोड़ी देर में हमें मजा आने लगा। अब दर्द के जगह थोड़ा जलन हो रहा था, लेकिन फिर भी मजा आ रहा था। हम खुद को लड़की के समान समझने लगे अब। धीरे धीरे उसका स्पीड बढ़ने लगा। दनादन कमर चलाने लगा और हमारे गांड़ में गपागप लंड पेलने लगा।

“आह आह आह ओह ओह ओह अम्मा अम्मा, ओह राजा ओह राजा, चोद, चोद।” मह मस्ती में भर के बोलने लगे।

“आह आह अब आया न मजा मेरी रानी। अब देख हम कैसे चोदते हैं तुझे।” इतना कहकर अब हमें कुत्ती की तरह झुका दिया और पीछे से मेरी गांड़ में लंड डालने लगा। मेरी कमर पकड़ कर फिर से किसी कुत्ते की तरह मेरी गांड़ चोदना शुरू किया।

“आह मेरे रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आह, ओह ओह ओह चोद मेरी गांड़, ओह आह अपनी रानी बना ले मेरे रज्ज्ज्जा, चोद हमें चोद।” हम पगला गये थे उस समय। गांड़ उछाल उछाल के लंड खाने लगा। वह मेरा लंड भी पकड़ कर हिलाता जा रहा था। मेरी छाती भी दबाता जा रहा था। हमें बड़ा ही सुख मिल रहा था। करीब पंद्रह बीस मिनट तक चोदने के बाद वह मेरी छाती को जोर से दबा कर हमसे चिपक गया। ऐसा लगा हमारी सांस रुक जाएगी। तभी ऐसा लगा कि मेरी गांड़ में पिचकारी छूटा हो। गरमागरम पानी मेरी गांड़ में फर्र फर्र छूटने लगा।

“आह ओह आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह मेरी रानी्ई्ई्ई्ई्ई, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी रंडी्ई्ई्ई्ई्ई।” कहते हुए चिपका रहा हमसे। तभी मेरा लंड भी टाईट हो गया और हम कांपने लगे। हमारे ढाई इंच लंड से भी सफेद सफेद गोंद जैसा फचफचा के कुछ निकलने लगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” ऐसा लगा जैसे हम हवा में उड़ रहे हों। बहुत आनंद आ रहा था। कुछ ही सेकेंड में मेरा बदन ढीला हो गया। उधर हमारे ऊपर से रोहित भी लुढ़क गया।

“बहुत मजा आया मेरी रानी। बहुत मस्त गांड़ है रे तेरा। चोद के दिल खुश हो गया। आज से तू हमारी रानी हो गयी।” वह बहुत खुश था। हम भी जिंदगी में पहली बार इतने खुश हुए।

“हां मेरे राजा। तुम बड़े अच्छे हो। बहुत मजा आया। आज से हम तेरी रानी बन गये। बस तेरी हो गयी, अब तू हमें रंडी बना या कुत्ती बना।” हम उससे लिपट कर चूमने लगे। बड़ा प्यार आ रहा था हमें उस पर। उस दिन पहली बार गांड़ चुदवा कर जो मजा मिला कि हम फिदा हो गये उस पर।

“यह किताब हमें दे दो।” हम बोले।

“ले ले मेरी रानी, ले ले।” कहते हुए उसनें वह किताब हमारे बैग में डाल दिया। उसके बाद हम अपने कपड़े पहन कर उस खंडहर से निकले। चलने में थोड़ी तकलीफ हो रही थी। गांड़ जल रहा था लेकिन फिर भी अच्छा लग रहा था। हमारी जिंदगी बदल गयी थी उस दिन। उस दिन के बाद रोहित हमको रोज उसी खंडहर में ले जा कर चोदता रहता था। धीरे धीरे यह हमारा आदत बन गया। अब बिना गांड़ चुदवाए हमको चैन नहीं मिलता था।

एक दिन रोहित स्कूल नहीं आया तो हमको बहुत खराब लग रहा था। बड़ा बेचैन था। हमको कुछ सूझ नहीं रहा था। फिर हमारी नजर सबसे पीछे बैठने वाले हमारे क्लास के ही रोहित की उमर के ही आस पास का एक लड़के शाहिद पर पड़ी। वह मुसलमान था, रोहित की तरह ही मजबूत लड़का था। वह पांच फुट लंबा काला लड़का था। वह भी हमें छेड़ने में पीछे नहीं रहता था। अंतिम पीरियड में हम भी पीछे चले गये और शाहिद के बगल में बैठ गये।

“क्या बात है चिकने। आज हमारे साथ?” वह मेरे गाल को नोचता हुआ बोला।

“हां, सोचा आज पीछे बैठ के देखें।” हम उसके जांघ पर हाथ रखते हुए बोले। वह हमको देखा और मुस्कुरा उठा।

“अबे, यहां काहे हाथ रख रहा है, यहां रख।” कहकर उसने मेरा हाथ अपने पैंट पर ठीक लंड के ऊपर रख दिया। हमनें भी बेशरम होकर पैंट के ऊपर से ही उसके लंड को पकड़ लिया। उसका लंड टाईट होने लगा। वह मुस्कुरा उठा।

“स्कूल के बाद चल मेरे साथ।” वह मेरे कान में बोला। हम समझ गये, हमारा निशाना सही जगह पर लगा है। स्कूल के बाद जैसे ही हम निकले, पीछे पीछे शाहिद भी आ गया।

“अबे, कहां चला? क्लास में तो मेरा लौड़ा पकड़ रहा था? भाग कहां रहा है?” वह पीछे से आ कर हमसे बोला।

“भाग कहां रहे हैं?”

“तो चल कहीं अकेले में। दिखाता हूं अपना लंड।” हम गनगना उठे उसकी बात सुनकर।

“चल तो रहे हैं।”

“कहां?”

“उस खंडहर में।” हम खंडहर दिखाते हुए बोले।

“अबे, तू पहले कभी गया है वहां?”

“हां।”

“किसलिए?”

“उसी लिए, जिसके लिए हम जा रहे हैं अभी।”

“अरे साले, किसके साथ?” वह ताज्जुब से बोला।

“राहुल के साथ।” हम बेधड़क बोले।

“राहुल के साथ? वाह साले। वह तो बड़ा हरामी है, क्या किया तुम लोगों नें वहां?” वह जानने के लिए उतावला हो उठा।

“उसनें हमको एक किताब दिखाया।”

“कैसा किताब?”

“फोटो वाला।”

“अबे कैसा फोटो वाला?”

“मर्द मर्द वाला।”

“साले पहेली न बुझा मादरचोद।”

“नंगा फोटो, ऐसा, लो देखो।” कहते हुए हमने वह किताब निकाल कर उसके हाथ में थमा दिया। उसने झपट कर मेरे हाथ से वह किताब ले लिया। अबतक हम खंडहर तक पहुंच चुके थे। वह किताब खोलने ही वाला था कि हम बोले, “यहां नहीं, यहां नहीं, खंडहर के अंदर चलो, कोई देख लेगा तो बोलेगा, हमलोग स्कूल में यही सब सीखते हैं।” हम उसे खींचते हुए खंडहर में ले आए, उसी जगह पर जहां रोहित और हमारे बीच चोदा चोदी होता था। वहां पहुंचकर हम बैठ गये इतमिनान से और जैसे जैसे वह किताब के अंदर का फोटो देखता गया, उसका लंड खड़ा होता गया। वह अब मुस्कुरा रहा था।

“तो ये सब देखते हो यहां तुमलोग?”

“देखा तो सिर्फ एक बार।” हम बोले।

“फिर? उसके बाद?”

“उसके बाद से हम यह करते हैं।” हम बेशरमी से बोले। हम देख रहे थे कि शाहिद का पैंट आगे से फूल गया था और वह पैंट के ऊपर से ही लंड पर हाथ रख चुका था।

“क्या मतलब?” हैरानी से बोला वह। “करते हो?”

“हां।” हम मुस्कुरा रहे थे।

“तुम कि वह?”

“करता तो रोहित है मेरे साथ।”

“वाह बेट्टा, रोहित तो बड़ा हरामी है? अकेले अकेले तेरे साथ मस्ती किये जा रहा है और हमको पता ही नहीं। चल साले चिकने लंडखोर, हमारा लौड़ा भी खड़ा हो गया। अब तू मेरा लंड भी खाने के लिए तैयार हो जा। आज तक किसी लौंडे का गांड़ नहीं चोदा, आज चोदेंगे।” कहते कहते फटाफट अपने पैंट खोलने लगा। शर्ट नहीं खोला वह। इधर हम भी चुदवाने के लिए पूरे नंगे हो गये। हमारा बदन देखकर वह दंग रह गया।

“शर्ट भी खोल ना।” हम बोले।

“ले बे चिकने खोल दिया।” कहते हुए शर्ट भी उतार बैठा। हम भी उसके नंगे बदन को देख कर सनसना उठे। हमसे उमर में बड़ा, हट्ठा कट्ठा, कला भुजंगा, गजब दिख रहा था। इस उमर में भी एकदम जवान लग रहा था। पूरे बदन पर बाल ही बाल उगा हुआ था। छाती पर, पेट पर, जांघों पर, और लंड के चारों तरफ, बाल ही बाल। उसका लंड तो और ही गजब। लंबा करीब आठ इंच का, मोटा करीब ढाई इंच का। लंड के सामने का सुपाड़ा खुला हुआ था, चमड़ा था ही नहीं वहां। सुपाड़ा गोल, गुलाबी, चमचमा रहा था। एक बार तो डर ही गये हम।

” बाप रे, इत्ता बड़ा्आ्आ्आ्आ्।” मेरा मुंह खुला का खुला रह गया।

“डर गया बे चिकना?”

“हां, मगर….”

“मगर क्या जल्दी बोल हरामी, चोदने के लिए मरा जा रहा हूं मां की चूत।”

“मगर कोशिश करूंगा।” डरते हुए हम बोले।

“तू कोशिश कर हम पूरा ठोकेंगे चिकने गांडू।”

“देख शाहिद, तू हमें चिकना नहीं चिकनी बोल, लड़की समझ ले हमें। अच्छा लगता है। रोहित भी ऐसा ही करता है।” हम शाहिद का लंड हाथ से पकड़ते हुए बोले। वैसे मेरा ढाई इंच का पतला नुनू भी टनक गया था, जिसे देखकर शाहिद मुस्कुरा उठा था। लेकिन मेरी छाती के उभार और बाल रहित चिकना, लड़कियों जैसा बदन और गोल गोल गांड़ देख कर उसके मुंह में पानी आ गया था।

“वाह, बहुत मस्त माल है रे तू तो। एकदम लौंडिया की तरह। लौंडिया भी फेल, तेरे सामने तो, खाली एक चूत बनाना भूल गया भगवान।” वह मुझे बांहों में भर कर बोला।

“हटिए जी, आप भी ना बस।” लड़कियों की तरह शरमाते हुए बोला।

“अय हय, ऐसे शरमाओगी तो मर ही जाएंगे हम।” अब वह हमें चूमने लगा। हम भी उसके नंगे बदन से चिपक गये। उसका आठ इंच का टनटनाया लंड ठीक मेरे नाभी के नीचे चुभ रहा था। उसने ज्यादा समय नहीं गंवाया। मेरी छाती को दबाते हुए बोला, “चल मेरी जान, अब हम शुरू करते हैं।”

“क्या जी?”

“और क्या, चुदाई, तेरी मस्त गांड़ की चुदाई।” वह मुझे ले कर उसी घास पर लिटा दिया। चित्त। वह मुझ पर चढ़ बैठा। मेरी टांगों को फैला कर उठा दिया। हम डर रहे थे कि उसका इतना मोटा और लंबा लंड ले सकेंगे कि नहीं, लेकिन अब हमारे लिए और कोई रास्ता भी नहीं था, बचने का। जानते थे कि थोड़ा मुश्किल होगा लेकिन अगर थोड़ा हिम्मत कर लें तो जरूर ले सकेंगे, यही सोच रहे थे हम। आखिर पहले पहल थोड़ा मुश्किल से ही सही, रोहित का लंड भी तो ले चुके थे हम। अब हमारे दोनों टांगों के बीच आ गया वह और जैसे लड़कियों को चोदा जाता है ठीक वैसे ही हम पर सवार था। अपने लंड पर थूक लगा कर मेरी गांड़ के दरवाजे पर टिका दिया। हमारा दिल बहुत बुरी तरह धड़क रहा था। शाहिद नें हमारे गांड़ के नीचे हाथ रखा और अपनी कमर से एक झटका मारा।

“आह्ह, धीरे, धीरे।” हम डर के मारे बोले। उसके लंड का सुपाड़ा फच से मेरी गांड़ में घुस गया था।

“हुम,”

दर्द नहीं हुआ। बेमतलब का डर रहे थे हम। शाहिद को रास्ता मिल गया था। समझ गया कि हमें दर्द नहीं हुआ, नहीं तो तड़प उठते हम। फिर वह धीरे धीरे अपना लंड मेरी गांड़ में उतारता चला गया।

“ले, आह थोड़ा और ले।” घुसता ही गया, घुसता ही गया। जब थोड़ा ही लंड घुसना बाकी था तब हमारी गांड़ के अंदर, अंतड़ियों में दर्द होने लगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, दर्द हो रहा है।” हम दर्द के मारे बोल पड़े।

“बस मेरी जान, थोड़ा ही रह गया। यह भी ले ले।” कहकर एक जोर का धक्का लगा कर पूरा लंड घुसा दिया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ हमारा अंतड़ी फट रहा है आह।” हम दर्द से छटपटाने लगे।

“बस हो गया रानी।” अब वह रुका। हमारा दर्द इस थोड़े समय रुकने से ही गायब हो गया और वह जीत गया, हमें जीत लिया। हम उससे चिपक कर एक बदन हो गये। अब कहां रुकने वाला था वह। हमें चोदने में मगन हो गया।

“आह राजा, ओह राजा, इस्स मेरे प्यारे चोदू, आह।” हमारे आनंदभरे आवाज से खुश होकर भच्च भच्च चोदने लगा।

“हां हां हां मेरी प्यारी रानी। आह हुं हुं हुं हुं।” हमारी छातियों के उभारों को मसल मसल कर चोदता रहा, चूमते हुए चोदता रहा, कमर पकड़ कर चोदता रहा, उछल उछल कर रगड़ रगड़ कर चोदता रहा। बाप रे बाप, पूरे आधे घंटे तक ठोकता रहा। इस बीच, “आ्आ्आ्आ्आ्आ इस्स्स्स,” हमारे लंड का पानी भी निकल गया। करीब आधे घंटे बाद हमें कस के दबाया और लंड से पानी छोड़ने लगा।

“आह्ह्ह्ह स्स्स्स्स्सा्आ्आ्आ्आली्ई्ई्ई् रंड्ड्ड्ड्डी्ई्ई्ई्ई्ई,” हांंफते, डकारते पूरी तरह झाड़ दिया अपने लंड का पानी और तब जा कर छोड़ा। पूरा निचोड़ कर छोड़ा हमें।

“आह रज्ज्ज्जा, बहुत अच्छे हो तुम।” हम उससे लिपट कर बोले।

“हां मेरी प्यारी रंडी, बड़ी प्यारी हो तुम। बड़ा मस्त है तेरा बदन, बड़ा मस्त है तेरी गांड़। दिल खुश हो गया। आज से तू मेरी रानी, मेरी रंडी।”

“हां रज्ज्ज्जा, हम तेरी हो गये आज से, हम तेरी रानी, तेरी रंडी, जो बोलो सब।” बड़ा प्यार आ रहा था हमें उस पर। पागलों की तरह उसके गालों, होठों को चूमने लगे। उसके बाद हम अपने कपड़े पहन कर अपने अपने घर चले गये। तब से यह सिलसिला चलता रहा। रोहित को भी पता चल गया कि शाहिद भी हमारा आशिक है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ा। उसे तो हमको चोदने से मतलब था, जब चोदने का मन होता चोद लेता था। बाकी हम और किससे चुदवा रहे हैं उससे उसको कोई मतलब नहीं था। इसी तरह हमें लगता है, हमारे क्लास के सभी लड़के हमें चोद चुके थे। हमारी हालत रंडी की तरह हो गयी। गांड़ मरवाते मरवाते, हमारा पढ़ाई में मन नहीं लगने लगा तो आगे नहीं पढ़ पाया। घरवालों ने देखा कि हमको पढ़ाना पैसा बरबाद करना है, सो पढ़ाई छुड़वा दिया। फिर हमारे बाप नें इस ठीकेदार, हर्षवर्धन दास, जो सिविल इंजीनियर भी है, के पास काम पर लगवा दिया। पढ़ना लिखना जानता था सो सुपरवाइजर बना दिया। हां, यह इंजीनियर भी हमारे स्कूली लड़कों की तरह ठीक पहचाना हमको। हमारा चेहरा और बदन के बनावट पर फिदा हो गया। वह भी हमारे जैसे लौंडों का रसिया है और बीच बीच में जब मर्जी हमारे साथ मस्ती कर लेता है। गांड़ मरवाने का जो आदत हमें उस समय लगा था, इस ठिकादार के साथ रहकर जारी रहा।”

इतना कहकर चुप हुआ। हम सब बड़ी तन्मयता से उसकी कहानी सुन रहे थे। काफी मजेदार था और उत्तेजक भी। मेरे अगल बगल सलीम और बोदरा बैठे थे। उधर कहानी चल रही थी और इन दोनों कमीनों के हाथ मेरी नग्न देह पर रेंग रहे थे। कभी मेरे उरोजोंं को सहला रहे थे तो कभी मेरी योनि। कहानी कामुक थी, इनकी हरकतें भी कम कामुक नहीं थीं।

“क्या बात है? फिर शुरू हो गये तुमलोग?” मैंनें इन्हें बनावटी झिड़की दी। उनके लिंग फिर तनतना चुके थे। कहा कुछ नहीं लेकिन मुझे गरम करके ही छोड़ा। उधर कांता और सोमरी का भी यही हाल था। मंगरू, रफीक और बाकी कुली भी उन दोनों के ईर्द गीर्द सिमटे उनके शरीरों से खेल रहे थे। कुल मिला कर माहौल फिर गरम हो चुका था। मैं सोच रही थी कि अब क्या करूं? फिर से पिस जाऊं या आगे की कहानी सुनूं। अंततः मैंने उनके आगे हथियार डाल दिया। “ठीक है, बाबा ठीक है, चोदे बिना मानोगे थोड़ी ना तुमलोग।चलो अब झाड़ ही दो अपनी गरमी।” मेरे कहने की देर थी कि जिसको जो हाथ लगा उसी पर चढ़ दौड़ा और हम महिलाओं और मुंडू को धर के रौंद डाला। जो गरम माहौल बन चुका था, उसमें हम खुद भी पसर जाने को बिल्कुल तैयार हो चुके थे। चुदाई का एक और दौर चला। हम रंडियां भी खुले दिल से चुदीं, उनके मनमाफिक ढंग से चुदीं। यह दौर अगले दो घंटे तक चला। सबकी गरमी उतरने के बाद मैं क्लांत स्वर में बोली, “हो गया?”

“हां हो गया,” हांफते हुए मंगरू बोला। मैंने देखा कि वासना के इस दूसरे दौर का तूफान शांत हो चुका था और सभी लस्त पस्त, अस्त व्यस्त इधर उधर लुढ़क कर अपनी सांसें दुरुस्त कर रहे थे।

“तू तो रुक मां के लौड़े। अभी तो आगे की कहानी सुनते हैं, फिर तेरे और बाकी लोगों के लंड का भी मजा लूंगी।” मैं भी दो कंबख्त औरतखोरों सलीम और बोदरा के बीच सैंडविच की तरह मसली जा कर हांफती, पूरी रंडी की तरह बेशरमी से बोली, “हां तो मुंडू, ये तो हुई तेरे गांडू बनने की कहानी। अब आगे बता, इन हरामियों को कैसे जमा किया एक साथ?”

“हां हां बताओ, बताओ।” सब एक स्वर में बोल उठे।

“ठीक है अब आगे सुनो।” मुंडू, जिसे दो कुलियों नें बुरी तरह रौंदा था, अपने को संयत करते हुए बोला। घड़ी का कांटा बता रहा था तीन बज रहा था इस वक्त। हमारे पास वक्त था अभी।

आगे की कहानी अगली कड़ी में। मुझे अपनी प्रतिक्रियाएं देते रहें। आप जैसे सुधी पाठकों की प्रतिक्रियाओं का स्वागत है और इसी से मैं खुद की लेखन क्षमता का मूल्यांकन भी करती हूं। तबतक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।