सिख्नी की चुत – पार्ट – 1

हेल्लो दोस्तो मे अस्लम खान हाज़िर हू एक नयी स्टोरी लेकर। ये स्टोरी सिख्नियो पर आधारित है। वेसे एक बात तों माननी पड़ेगी दोस्तो के सिख्नियो को उन्के रब ने बहुत ही शौंक से बनाया है, उन्के एक एक अंग को ताराशा है। सिख्निया बहुत ही चुद्द्कड़ होती है। तो आईये स्टोरी पर आते है।
सिख्नी कमलदीप कौर ठाणे के निरमाण विहार की एक कॉलोनी मे अकेली रह्ती है और उसके मा बाप औरंगाबाद मे रह्ते है। कमलदीप कौर रन्ग की गोरी चिट्टी, उमर 23साल और फिगर 323034है। कमलदीप कौर बहुत ही धार्मिक औरत है। वह हमेशा कुर्ती सलवार पहनती और बाकी सिख्नियो की तरह ही सर पे पगडी बांधती है। कमलदीप कौर जिस रुम मे रह्ती थी उसके साथ वाले रुम में अब्दुल कादिर नाम का मुसलमान रह्ता है। अब्दुल रन्ग का काला, उमर 40साल और जिस्म गठीला मस्लर है। ये दोनो रुम एक ही मालिक के है तो कमरो के भीतर एक दरवाजा है जो अन्दर से दोनो कमरो को एक करता है। सिख्नी कमलदीप कौर ठाणे मे एक प्राइवेट जॉब करती है अब्दुल भी अपनी एक दुकान चलाता है।
कमलदीप और अब्दुल दोनो को अच्छी तरह से जन्ते है और दोनो फ़्री टाईम मे अक्सर बाते करते और साथ चाय पीते है। अब्दुल एक बहुत हरामी आदमी है जो हार किसी औरत को चोद्ना चाहता है। वह जब भी कमलदीप को देखता तो हमेशा उसे चोदने के बारे मे सोचता रहता हालाके अब्दुल कमलदीप से 17साल बड़ा है।
एक दिन जब कमलदीप जॉब से वापिस आयी तो उसने अपने कमरे का दरवाजा खोलने के लिये पर्स मे हाथ डाल कर चाबी निकालने लगी, लेकिन परस मे चाबी नही थी। कमलदीप ने पुरा परस छान दिया लेकिन उसे चाबी नही मिली तो वह थोडा परेशान हो गयी। इतने मे अब्दुल भी आ गया, “कया हुआ कमलदीप बहर खडी हो ” अब्दुल ने कमलदीप को बाहर खडी देख पुछा।
“कुछ नही अब्दुल मियां वो चाबी कही खो गयी है” कमलदीप ने परेशानी मे कहा। “तो इसे तोड दो ना फिर” अब्दुल ने ताले को हाथ मे पकड़ते हुए बोला।
“लेकिन मे केसे तोडू, कुछ है नही मेरे पास” कमलदीप ने कहा। “ओह तो ऐसा करो तुम मेरे कमरे के भीतर के दरवाजे से अपने कमरे मे चली जाना, बाद मे हम ताला तोड़ देंगे” अब्दुल ने कहा। “ठीक है”कमलदीप ने हामी भरी। अब्दुल ने अपने कमरे का दरवाजा खोला, कमलदीप और अब्दुल दोनो अन्दर आ गये तो अब्दुल ने दरवाजा लगा दिया, और दूसरा दरवाजा खोला जिससे कमलदीप अपने कमरे मे चली गयी और अब्दुल को थैंक्स बोल् दरवाजा बन्द कर लिया। कमलदीप अपने कपडे चेंज करने लगी। अब्दुल ने अपने कपडे उतारे और अंडरवेअर के उपर से एक धोत्ती पहन ली।
कुछ समय बाद कमलदीप ने दरवाजा खोला और अब्दुल के कमरे मे आ गयी। अब्दुल अपने कमरे मे बैड पर बेठा था। “अब्दुल मियां वो दरवाजा खोल देते अब” कमलदीप ने अब्दुल को कहा। “खोल देता हू कमलदीप, आओ बेठो ना कित्ने दिनो बाद आयी हो तुम” अब्दुल कमलदीप को देखकर बोला।
“मुझे ऑफिस का काम है अब्दुल मियां फिर कभी बेठ कर बात करेगे” कमलदीप बोली।
“ठीक है कमलदीप खोलता हू” अब्दुल ने कहा और एक सरिया लेकर ताले को तोड़ दिया। ताला तोड अब्दुल ने दरवाजा खोल दिया। कमलदीप ने अब्दुल को थैंक्स कहते हुए कहा, “अब्दुल मियां चाय पियेगे अप”।
अब्दुल तो कमलदीप के साथ वक़्त बिताने का बहाना ढ़ूँढ़ता रहता था। “अरे हा बई क्यो नही, सिख्नी चाय पर बुलाए और हम ना एसा हो ही नही सक्ता” अब्दुल ने जवाब दिया। अब्दुल अक्सर कमलदीप को सिख्नी कहकर ही बुलाता था, और कमलदीप भी आगे से मुस्कुरा देती। “तो आईये ना फिर”कमलदीप ने कहा और अन्दर चली गयी। अब्दुल भी सिख्नी के 34के मटकते चुतड्ड देखता हुआ पीछे कमरे मे आ गया।
“बेठिए अब्दुल मियां मे चाय बना के लाती हू” कमलदीप ने कहा और चाय बनाने के लिये अन्दर किचन मे चली गयी। अब्दुल वहा बेठा बेठा कमरे को देखने लगा, अचानक से उसकी नज़र ट्रंक के उपर पडी एक तलवार पर चली गयी। अब्दुल उठ कर पास आया और उसे हाथो मे लेकर देखने लग गया। इतने मे कमलदीप भी चाय लेके आ गयी। “ये किस लिये है कमलदीप” अब्दुल तलवार दिखाते हुए बोला।
“ये, ये तो आतमरक्षा के लिये है अब्दुल मियां कोई चोर आ जाये जा कोई लफंगा तो उसके लिये” कमलदीप ने जवाब दिया। “वो तो ठीक है लेकिन मेने आज तक किसी लड्की या औरत के पास तलवार नही देखी” अब्दुल बोला। तो फिर वो सिख्नी नही होगी अब्दुला मियां” कमलदीप बोली। “अच्छा, तुम तो एसे बोल रही हो जेसे सिख्निया बहुत बहादुर होती है” अब्दुल कमलदीप को देखकर बोला। “तो नही होती है कया, आप शायद जानते नही शेरनीयां होती है हम” कमलदीप ने की तरफ देखते हुए बोला।
“तो शेरनी जी इस तरफ भी देख्लो हम मुस्लिमस भी शेरों से कम नही है” अब्दुल तलवार रखते हुए बोला। “हा जानती हू अब्दुल मियां दुनिया मे 14-15मुल्क है आपके, बहुत गिनती है शेरो की” कमलदीप ने कहा।
“हा है तो, बस कमी एक ही चीज की मार दही है अब हमे” अब्दुल बोला। “और वो कया है” कमलदीप ने पुछा। “यही के वहा शेरनीयां नही है” अब्दुल ने कमलदीप को देखकर कहा। “अच्छा जी, चाही पी लिजिए वर्ना ठंडी हो जायेगी” कमलदीप हस्कर बोली।
अब्दुल अक्सर कमलदीप के साथ एसे डबल मीनिन्ग बताए करता और कमलदीप हंस कर उन्हे टाल देती।
“कया हुआ सिख्नी कुच जवाब नही दिया” अब्दुल ने चाय का कप उठाते हुआ कहा। “शेरनीयां एसे हार किसी को मिलती अब्दुला मियां” कमलदीप बोली।
“छोडीये ना आप भी कया बाते लेकर बेठ गये, आपकी दुकान केसी चल रही है अब्दुल मियां” कमलदीप ने बात को टालते हुए कहा। “दुकान अच्छी चल रही है, तुमरी जॉब का कया हाल है” अब्दुल ने पुछा।
“हा अच्छी जा रही है, मेरि भी और गगन की भी” कमलदीप बोली। गगनजीत कौर कमलदीप की दोस्त है, अब्दुल कयी बार उसे मिल चुका है। “अरे गगन को तो मे भुल ही गया था, केसी है वो” अब्दुल ने पुछा। “अच्छी है वो अब्दुल मियां” कमलदीप बोली। “अब कभी मिलने भी नही आयी, तबियत तो ठीक है ना उसकी” अब्दुल बोला। “हा ठीक है अबदुल मियां बस काम ही इतना जयादा है के वह फ़्री नही हो पाती” कमलदीप बोली। “कोई बात नही, लेकिन उसे बोल्ना जरूर के मेने पूछा था उसके बारे मे” अब्दुल ने कहा। “हा अब्दुल मिया जरूर बोलुगी उसे” कमलदीप ने जवाब दिया।
“अच्छा तो शेरनी जी अब हम चलते है” अब्दुल चाय का कप रखते हुए कमलदीप की तरफ देख कर बोला।
कमलदीप भी अब्दुल की बात सुन मुस्कुरते हुए बोली “ठीक है शेर अब्दुल मियां”।
अब्दुल भी हंस पढ़ा और अपने कमरे मे चला गया। कमलदीप ने दरवाजा बन्द किया कर ऑफिस के काम मे बिज़ी हो गयी।

Comments