कामिनी की कामुक गाथा (भाग 74)

पिछली कड़ी में आपलोगों नें पढ़ा कि अपने तन की वासनात्मक भूख मिटाने हेतु मैं अपने ही नये भवन के निर्माण में कार्यरत मजदूरों से संसर्ग सुख प्राप्त करने का जोखिम भरा निर्णय ले बैठी थी। उस नवीन, प्रयोगात्मक प्रयास में रोमांचकारी योजना भी बना बैठी। ऊपरवाले की मेहरबानी से सबकुछ वैसा ही होता गया जैसा मेरे मन में था। एक दो को छोड़कर सभी कामगर यथासमय हमारे घर में उपस्थित हुए और स्वच्छंद होकर वासना का नंगा नाच करने लगे। मैं उस सामूहिक कामक्रीड़ा में शामिल होकर रंडियों की तरह अपने तन का रसास्वादन कराती रही। वासना के उस खेल के प्रथम दौर की समाप्ति के पश्चात मुंडू अपने साथी कामगरों के समूह निर्माण के बारे में बताना अरंभ किया।

सर्वप्रथम उसनें बताया कि किस तरह उसके अंदर समलैंगिकता का भाव जागृत हुआ। उसकी शारीरिक बनावट और सौंदर्य से आकर्षित होकर सर्वप्रथम उसके सहपाठी रोहित नें एक दिन अपनी कुटिल चाल में फांसकर एक एकांत खंडहर के अंदर उसे गुदामैथुन के आनंद से परिचित कराया। एक गंदी चित्रों वाली पुस्तक दिखा कर मुंडू की कामेच्छा को जगाया और उसका कौमार्य भंग कर दिया। रोहित तो बदमाश था लेकिन उसकी बदमाशी नें मुंडू के अंदर समलैंगिक संबंध के प्रति आकर्षण का सृजन कर दिया। तत्पश्चात यह आकर्षण, लत में तब्दील हो गया। उसी लत के वशीभूत, उसनें दूसरे सहपाठी शाहिद को अपने आकर्षण पाश में बांध कर उससे भी गुदा मैथुन करवा बैठा। फिर तो यह सिलसिला चल पड़ा और अपने क्लास के ताकरीबन हर लड़के से करवाता चला गया। इस चक्कर में उसकी पढ़ाई लिखाई का कबाड़ा हो गया, नतीजतन आगे नहीं पढ़ पाया और मजबूरन उसके पिता नें उसे अपने एक परिचित ठेकेदार के यहां काम पर लगवा दिया।

वह ठेकेदार एक आर्किटेक्ट हर्षवर्धन दास था, जिसनें उसके व्यक्तित्व से मोहित हो कर अपने यहां सुपरवाइजर के रुप में रख लिया। मुंडू के अन्य आशिकों की तरह दास बाबू भी उस पर हाथ साफ करते रहे। अब आगे:

“तो मुंडू बाबू, चल अब आगे बता। तूने तो सारे क्लास के लड़कों को बिगाड़ दिया।” मैं बोली।

“हमने कहां बिगाड़ा। सब खुद ही मेरे पीछे पहले से पड़े थे। पहले रोहित नें हमें बिगाड़ा फिर शाहिद तो खुद ही मेरे पीछे कुत्ते की तरह चला आया था।”

“चला आया कि कुतिया की तरह तू खींच लाया।”

“जो हो, आया तो! चोदा तो!”

“और बाकी?”

“बाकी लोगों के बीच बात फैली तो सभी कुत्तों की तरह मेरे पीछे पड़ गये।”

“पूरे क्लास में एक तू ही मिला था उन्हें?”

“नहीं ऐसा बात नहीं है। वे लोग आपस में भी ये सब करने लगे थे।”

“ओह, तो तूने यह बीमारी सबके बीच में फैला दी।” मैं बोली और सभी हंस पड़े।

“अब इसमें हमारी क्या गलती? हमेशा हम तो मिलते नहीं थे। उनको चोदने का चस्का लग गया था तो क्या करते? आपस में ही काम चलाने लगे।”

“वाह, तूने तो पूरे क्लास को गांडुओं का क्लास बना दिया।” सभी फिर ठठाकर हंस पड़े।

“लड़कियों की तरफ किसी लड़के का ध्यान नहीं जाता था क्या?” मैं पूछी।

“जाता था, जाता था, लेकिन लड़के क्या करते। लड़कियों पर बुरी नजर डालना खतरनाक भी तो था। छेड़ो तो फंसो। कुछ ऐसा वैसा बात बोलो तो फंसो। सबसे सुरक्षित हम लड़कों का आपसी संबंध ही था। सो हम लड़के आपस में ही मजे करते थे। हां, शाहिद दो लौंडियों को पटा कर चोद चुका था, असल में वे लड़कियां खुद ही बदमाश थीं। शाहिद नें खुद बताया था, मगर हमें क्या। हमें वह पहले से छेड़ता रहता था दूसरे लड़कों की तरह, लेकिन उस दिन पहली बार उसे पता चला कि हम किस तरह के लड़के हैं। उसके बाद उसे भी मेरा ही चस्का लग गया। उसके बाद बाकी दोस्तों की लाईन लगी सो अलग।”

“खैर, यह सब छोड़, अब बता, इन सारे नमूनों को कहां कहां से ढूंढ़ ढूंढ़ कर इकट्ठा किया?” मैं बोली।

“बताता हूं बताता हूं। सलीम और रफीक तो पहले से इंजीनियर साहब के साथ काम करते थे। इनको पता नहीं था कि हम मरदों में रुचि रखते हैं। इसी तरह रेजा सुखमनी और रूपा भी पहले से इनके साथ काम करते थे, असल में ठेकेदार साहब नें इन दोनों को पसंद किया था और चोदने के चक्कर में अपने यहां काम पर रखा था। क्या, सही कह रहे हैं न हम?” सलीम और रफीक की ओर देखते हुए बोला।

“हां हां सही बोल रहे हो। इससे हमको भी फायदा हो गया। बीच बीच में हम भी उनके साथ मस्ती कर लिया करते थे।” सलीम बोला।

“सोमरी बाद में हमारे साथ आई। असल में मंगरू इसको लाया हमारे साथ। मंगरू, बोदरा, खोकोन, बोयो और हीरा को हम लाए।” मुंडू आगे बोलने लगा।

“कैसे?”

“हमारे घर में टॉयलेट नहीं था। हम पास वाले तालाब के किनारे जाते थे। तालाब के एक तरफ ऊंची ऊंची झाड़ियां थीं। उन झाड़ियों के पीछे हम पैखाना करते थे। एक दिन हम वहीं झाड़ियों के पीछे छिप कर पैखाना कर रहे थे उसी समय झाड़ियों के पीछे से हमनें देखा, यह मंगरू तालाब में भैंसों को नहला रहा था। तालाब के आसपास कोई नहीं था। यह एक भैंस के पीछे खड़ा होकर उसकी पीठ रगड़ रहा था। भैंस पानी में आधा डूबा हुआ था। मंगरू भी कमर से ऊपर तक पानी में डूबा हुआ था। मंगरू ऊपर से नंगा था, उसका काला कलूटा बदन चमक रहा था। कमर में एक गमछा बांधा हुआ था शायद, जो कमर से ऊपर उठ कर पानी के ऊपर तैर रहा था। हमनें गौर किया कि भैंस के पीठ को रगड़ते हुए उसका हाथ आगे पीछे हो रहा था और वैसे ही ही इसका कमर भी आगे पीछे हो रहा था। हमें शुरू में समझ नहीं आया कि हाथ से रगड़ते हुए इसका कमर क्यों आगे पीछे हो रहा है। कुछ ही देर में सब समझ में आ गया जब मंगरू भैंस के पीछे चिपक कर उसकी पीठ पर सर रख कर लंबी लंबी सांसें लेने लगा। ओह, तो ये बात है, यह साला असल में पीछे से भैंस को चोद रहा था। इतनी देर में उसका गमछा खुल कर पानी के ऊपर तैरते हुए कुछ दूर तक चला गया था और मंगरू को होश ही नहीं था। देख कर हमें बड़ा मजा आ रहा था, साला और कोई नहीं मिली, भैंस ही मिली थी चोदने को। अब हम अपनी जगह से निकले और तालाब किनारे जा कर गांड़ धोने लगे। मंगरू को आभास हो गया कि तालाब किनारे कोई है। यह हड़बड़ा कर अपना गमछा देखने लगा। गमछा तो पानी में तैरता हुआ किनारे आ चुका था। वह हमारी ओर देखने लगा। शायद शरमा रहा था कि गमछा बिना वह पूरा नंगा था। उसका हाफपैंट, चड्ढी और बनियान तालाब के इसी किनारे था जहां हम थे। हम समझ गये कि नंगा मेरे सामने पानी से निकलने में शरमा रहा था।

“क्या हुआ?” उसे असमंजस में देख कर हम बोले।

“वो मेरा गमछा।” गमछे को दिखा कर शरमाते हुए बोला।

“ले ले आके।” हम बोले।

“नंगे हैं।”

“तो क्या हुआ, यहां कोई औरत नहीं है। आके ले ले।” हम बोले।

“तुम हो ना।”

“लड़का हो कर लड़के से शरमाते हो?” हम हंसते हुए बोले। यह झेंपता हुआ धीरे थीरे किनारे आया। जैसे ही उसके कमर का निचला हिस्सा पानी से बाहर आया, हम दंग रह गये उसके लंड को देखकर। सोया हुआ, सिकुड़ा हुआ लंड भी छ: इंच से कम नहीं था और वैसा ही मोटा। हे भगवान, यह सोया हुआ है तो इतना बड़ा, खड़ा होगा तो कितना बड़ा होगा? सोच कर ही हमारे बदन में सुरसुरी होने लगा। मरवाने को मन मचल उठा। बदन तो इसका मस्त था ही। वह अपने गमछे की ओर झपटा और फट से कमर में लपेट लिया। हमें हंसी आ गयी।

“क्या रे, तू भैंसी नहला रहा था की क्या कर रहा था?” हम मुस्कुराते हुए बोले।

“भैंसी ही तो नहला रहा था।” शरमाते हुए यह बोला।

“हम सब समझ रहे हैं क्या कर रहा था।”

“क्या कर रहे थे?”

“बताएं?”

“हां” ढिठाई से बोला वह।

“साले हम नहीं समझ रहे हैं? भैंसी को चोद रहा था ना?” अब क्या बोलता।

“नननननहीं तो। हम तो हम तो हम तो…..” हकलाने लगा।

“हम तो हम तो क्या?”

“भैंसी नहला रहे थे।”

“हाथ से भैंसी नहला रहे थे, और लंड से?” हम उसके लंड की तरफ उंगली दिखा कर बोले। उसका हाथ अनायास ही अपने लंड पर चला गया। शरमा गया वह।

“हें हें हें हें” झेंंपी सी हंसी हंस रहा था वह।

“हंसो मत, चलो दिखाओ अपना लंड, जरा देखें तो कितना बड़ा है?” हम बोले।

“नहीं।” वह बोला।

“साले, ग्वाला (भैंसी के मालिक) को बता देंगे।” हम धमकी देने लगे।

“नहीं, मत बताना।” डर गया मेरी धमकी से।

“तो दिखाओ।”

“यहां नहीं।”

“तो कहां?”

“उधर, झाड़ी के पीछे।”

“चलो।” हम घनी झाड़ियों के बीच चले गये, यह भी अपने कपड़े उठाकर मेरे पीछे पीछे आया। वहां सुनसान था और किसी के द्वारा देखे जाने का डर नहीं था। “चलो, अब गमछा हटाओ।” झिझकते हुए उसनें अपना गमछा हटाया तो हम अकचका गये। इतने पास से देख रहे थे, इसके लंबे चौड़े बदन को और इसके झुलते हुए लंड को। बाप रे बाप, इसका सोया हुआ लंड भी कम खतरनाक नहीं लग रहा था। हम तो ठहरे लंडखोर एक नंबर के, उसके लंड को पकड़ के देखने लगे।

“यह क्या कर रहे हो?” वह बोला।

“पकड़ के देख रहे हैं और क्या।” वास्तव में।

“हमको शरम लग रहा है।”

“साले, भैंस को चोदते समय शरम नहीं लग रहा था?”

“वह तो भैंस है ना?”

“और हम?”

“तुम तो आदमी हो ना।”

“चुप, इतना सुंदर लंड रखकर शरमा रहे हो हमसे? खा जाएंगे क्या?” कहकर उसके लंड को सहलाने लगा। इसे अब अच्छा लग रहा था। शरम धीरे धीरे खतम हो रहा था। उसका लंड भी खड़ा हो रहा था और उसका साईज बढ़ता जा रहा था। कुछ ही देर में इसका लंड पूरा टाईट हो गया। बाप रे, दस इंच के करीब लंबा हो गया और वैसा ही मोटा। करीब ढाई से तीन इंच मोटा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” यह मस्ती में आ गया था। मेरी गांड़ में खुजली होने लगी।

“मेरा गांड़ चोदो।” हम हुकुम देने लगे।

“नहीं।”

“ग्वाला को बता देंगे।”

“नहीं, मत बताना।”

“तो चोदो।” इतना कहकर हम अपने कपड़े खोलने लगे। जब हम पूरे नंगे हो गये तो हमारे बदन को देखकर इसकी आंखें चमकने लगीं। हम समझ गये कि मेरे बदन को देखकर ललचा गया है। “आओ।” हमनें इसको अपना बदन सौंप दिया। यह हमको अपने बांहों में भर लिया।

“बड़ा मस्त बदन है।”

“हां, है तो।” हम इसकी बांहों में मचलते हुए बोले।

“बड़ा मस्त गांड़ है।” हमारी गांड़ सहलाते हुए बोला।

“हां, है तो।”

“छाती लड़कियों जैसा है। चूची जैसा।”

“हां है तो। अब शुरू कर ना।” हम मरवाने के लिए मरे जा रहे थे। थोड़ा डर भी लग रहा था। पहली बार इतना बड़ा लंड से पाला पड़ा था। यह हमारी छाती दबाने लगा, गांड़ दबाने लगा और हम पगलाए जा रहे थे। अब इसने हमें वहीं घास पर उल्टा लिटा कर हम पर चढ़ गया। लंबा चौड़ा गबरू जवान, अपने लंबे मोटे लौड़े के साथ। यह अपना लंड हमारी गांड़ से सटा ही रहा था कि हम बोल उठे, “थूक लगा मादरचोद। हमारी गांड़ का कबाड़ा करना है क्या?” इसने जल्दबाजी में हमारी गांड़ पर थूका, और दुबारा चढ़ गया। हमारा डरना बेकार नहीं था। इसके बाद जब यह अपने लंड पर जोर लगाने लगा तो इसका लंड हमारी गांड़ का दरवाजा जबरदस्ती फैला कर घुसने लगा।

“आह आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” दर्द हो रहा था। हमारी गांड़ फटने फटने को होने लगी। हमारी सारी मस्ती हवा हो गयी। हम छूटने की कोशिश करने लगे, लेकिन इसे तो मिल गया था एकदम चिकने टाईट गांड़ का स्वाद। घुसाता चला गया, घुसाता चला गया और हमको लग रहा था जैसे कोई लंबा डंडा जबरदस्ती हमारी गांड़ में ठूंसे जा रहा हो। “आह्ह्ह्ह मांआंआंआंआं।” हमारे मुंह से चीख निकल गयी।

“बंद कर चिल्लाना साले गांडू मादरचोद।” यह डांट रहा था। “साले, गांड़ मरवाने के लिए मर रहा था, अब चोद रहे हैं तो चिल्ला रहा है।” यह हमसे दुगुना ताकतवर जवान था, हमें कस के दबा रखा था, हिल भी नहीं पा रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे हमारी अंतड़ी भी फटी जा रही हो। हम तो खुद ही फंसे थे इस मुसीबत में, शिकायत करें तो किससे करें। गांड़ फटी जा रही थी, अंतड़ी फटी जा रही थी, जान निकली जा रही थी, आंख से आंसू बह निकले थे।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, धीरे, ओह्ह्ह्ह्ह्ह धीरे।” हम बेबस थे। अब चुदने से बच नहीं सकते थे।

“धीरे? अब धीरे?” कहते न कहते हमारी कमर पकड़ कर कुत्ते की तरह दनादन ठोकना शुरू कर दिया इस हरामी नें। कुछ देर तो हमारी जान निकलती रही, मगर थोड़ी देर बाद मेरी गांड़ ढीली हो गयी और मजे में लंड लेने लगे। मजा आ रहा था अब। यह तो एकदम कुत्ते की तरह गचागच चोदने में लगा था, लेकिन हम भी अब अपनी गांड़ इसके सामने परोस के मजे से चुदवाए जा रहे थे।

“अच्छा लग रहा है अब।”

“तो ले, हुं, हुं, हुं, आ आ आ ले और ले।” बाप रे बाप, इतना स्पीड? गच गच गच गच गच्चाक। पागल हो गया था यह और हम भी पागल। पता नहीं कितना देर चोदा, लेकिन जितना देर चोदा, बहुत मजा दिया। रगड़ के चोदा, दबा दबा के चोदा। फिर फरफरा के जब लंड का रस डालने लगा हमारे गांड़ में, हम तो स्वर्ग पहुंच गये थे। पूरा झड़ने के बाद जब हमको छोड़ा तो हम धपाक से घास पर गिर पड़े।

“बड़ा मजा आया राजा।”

“हमको भी।” हांफता हुआ बोला यह। “इतना टाईट होता है गांड़, हमको पता नहीं था। बहुत अच्छा लगा।”

“हमको भी। क्या नाम है तेरा?” हम पूछे।

“मंगरू।”

“क्या करते हो?”

“कुछ नहीं।”

“काम करोगे?”

“क्या काम?” शशंकित स्वर में बोला यह।

“अरे कुछ भी, जो तुम चाहो। हम घर बनाने का काम करते है। पगार देंगे। वैसे हमको तेरा लंड पसंद आया, इसी लिए बोल रहे हैं।”

“ठीक है। करेंगे काम। हमको भी तेरा गांड़ बहुत पसंद आया।” यह खुश हो कर बोला। पगार का पगार, गांड़ का गांड़।

“वाह रज्ज्ज्जा, ये हुआ न बात। तो कल से ही आ जाओ काम पर। लेकिन याद रखना, जब भी हमको चोदोगे तो औरत समझ के चोदना।”

“ठीक है।”

“सिर्फ ठीक है नहीं, ठीक है रानी बोल, लेकिन सबके सामने नहीं, अकेले में।”

“ठीक है मेरी रानी।”

“हां, अब ठीक है मेरे प्यारे चोदू जी।”

उस दिन के बाद मंगरू हमारे साथ काम करने लगा। इस तरह से हमारे यहां एक और चुदक्कड़ शामिल हो गया। सलीम और रफीक तो पहले से दास बाबू के साथ काम करते थे। दास बाबू नें हमको अपने यहां सुपरवाइजर रखा तो इसलिए कि उनको हम पसंद आ गये थे। वे तो हमारा गांड़ मारते ही थे, सलीम और रफीक भी समझ गये कि हम गांडू हैं। ये तो इससे पहले दास बाबू के पसंद की दो रेजा, रूपा और सुखमनी पर ये लोग हाथ साफ करते थे। हमको लगता है दास बाबू को पता है सब कुछ, लेकिन उससे क्या, उसे तो चोदने से मतलब है। हमको समझ आ गया था कि सलीम और रफीक एक नंबर के औरतखोर हैं, हमें इनसे भी चुदवाने का मन होने लगा। हमको मुश्किल नहीं हुआ। अपने आप हो गया। जहां कहीं हम घर बनाते हैं, वहां गोदाम तो बनता ही है।उसी गोदाम मेंं हमेंं मंगरू या दास बाबू चोद लेते थे। एक दिन मंगरू हमको चोद रहा था तो सलीम देख लिया। पहले यह हमको चोदा फिर रफीक को बताया, यह भी मेरा आशिक बन गया।

फिर फंसा बोयो। उसको हमारे बारे में बताया यही मंगरू। बोयो का दोस्त था हीरा। हीरा भी इसी तरह हमारे ग्रुप में आया।  यह पहले दूसरी जगह काम करता था। जब हीरा को मेरे बारे में बोयो से पता चला तो यह वहां का काम धाम छोड़ कर हमारे यहां आ गया। एक नंबर का चुदक्कड़ है हीरा और वैसा ही हरामी। हमारे चक्कर में हीरा आया और हमारा ही आदमी हो गया। यही सोमरी को फंसा कर हमारे यहां काम पर लाया। अब बता साले हीरा, कैैैसे फंसाया सोमरी को?” मुंडू हीरा की ओर देख कर बोला।

हीरा जो सोमरी के बगल में ही बैठा हुआ उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को सहला रहा था, बोला, “अब हम का बताएं?” धूर्त हीरा मुस्कुरा रहा था।

“हंस मत हरामी, बता, कैसे फंसाया सोमरी को?” मैं हीरा की ओर आंखें तरेरती हुई बोली।

“बताते हैं, बताते हैं।”

“ठीक है बता, लेकिन जल्दी बता। समय जा रहा है। इस मुंडू की कहानी सुनते सुनते समय भी निकल रहा है और…।” मैं अपनी जगह कसमसाते हुए जानबूझ कर रुकी।

“और?” सलीम प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए बोला।

“अब मेरा मुंह मत खुलवा मादरचोद।” मैं कलकलाते हुए बोली।

“बोल ही दो बुरचोदी।”

“तुमलोग हिजड़े हो क्या? कुछ हो नहीं रहा है ऐसी कहानी सुनकर तुमलोगों को?”

“ओह्ह्ह्ह्ह्ह, साली कुत्ती, ऐसा बोल ना लंडखोर।” रफीक, जो मेरी देह से सटकर बैठा था, अब बोला। मैं उन सबके बीच उन्हीं के स्तर की हो गयी थी। बड़े छोटे का भेदभाव खत्म हो चुका था, तभी तो ये लोग इतने खुल्लमखुल्ला, बिंदास, बिना किसी झिझक और शरम के मुझसे ऐसी बात कर रहे थे। मुझे बड़ा आनंद आ रहा था। रफीक नें सिर्फ कहा नहीं बल्कि मेरे उरोजों को मसलना भी आरंभ कर दिया।

“हट साले।” मैं उसकी पकड़ में छटपटाती हुई बोली।

“न न न न, अब क्या हट? देख हमारी चोदनी, हमारे लौड़े भी बमक गये हैंं। चल एक बार और ठोकिए लेते हैं। क्या बोलते हो भाई लोग। हमारी चोदनी चुदना चाहती है रे।” रफीक मुझे अब चूमने लगा था।

“हां हां, ठीक ठीक। चलो एक बार और हो जाए।” सब रफीक के समर्थन में सुर में सुर मिला कर बोल उठे। जिसे जो शिकार मिला, उसी पर झपट पड़े। मुझ पर तो कहर ही टूट पड़ा। सबसे कद्दावर, ताकतवर, विशालतम भीमकाय लिंगवाला मंगरू न जाने कब से मुझ पर दृष्टि जमाए था, सिग्नल मिलते ही चीते की फुर्ति से मुझ पर झपट्टा मारा। इधर इतने निकट के शिकार को छिनते देख कर तड़प उठा रफीक और यही हाल सलीम का भी था। मंगरू मुझे गुड़िया की तरह गोद में उठा कर भागने लगा।

“भागते कहां हो लौड़े के ढक्कन?” सलीम और रफीक उसके पीछे भागे। उधर सोमरी, कांता और मुंडू पर बाकी लोग टूट पड़े।

“ओह भगवान, उधर कहां ले जा रहे हो मुझे?” मैं मंगरू की बांहों में छटपटाती हुई बोली।

“तो किधर ले जाएं रंडी?”

“इधर” मैं अपने बेडरूम की तरफ दिखाते हुए बोली।

मुझे गोद में उठाए मंगरू नें एक लात बेडरूम के दरवाजे पर मारा और सिर्फ उढ़का हुआ दरवाजा भड़ाक से खुला। उसनें बड़ी उतावली और बेदरदी से मुझे बेड पर पटक दिया और चढ़ बैठा मुझ पर।

“रुक बहनचोद, तू अकेले ऐसे नहीं चोद सकता। हम भी चोदेंगे।” रफीक और सलीम भी हमारे पास आ पहुंचे थे।

“नहीं नहीं, ऐसा कैसे?” मैं मंगरू के नीचे दबी बोली।

“एक साथ, बांट के खाएंगे चोदनी को।”

“कैसे?”

“तू उठा के भागा ई बुरचोदी को, तू जीता। बोल तू क्या करना चाहता है?”

“हम इसकी गांड़ मारेंगे। मस्त गांड़ है। बहुत मन था इसकी गांड़ चोदने का।” मंगरू बोला तो मैं सिहर उठी।

“नहीं, नहीं, फाड़ दोगे।” मैं बोली।

“फटेगी तो फटेगी, हम तो चोदेंगे गांड़ ही।” ढिठाई से मंगरू बोला।

“ठीक है तुम गांड़ चोदो, हम बुर में लंड ठोकेंगे।” सलीम बोला।

“और हम?” हम क्या गांड़ मरवाएं?” रफीक चिढ़ कर बोला।

“अबे भोंसड़ी के, तू लंड चुसवा तब तक।” सलीम बोला।

“हां यह सही है।” रफीक सहमत हो गया। अब क्या था, मंगरू नें मुझे तिरछा लिटा कर मेरी बांयी टांग उठा कर पीझे से मुझ पर हमला कर बैठा।

“आह्ह्ह्ह नहींईंईंईंईंईंईन।” मैं चीखी।

“हरामजादी चिल्लाती है? अभी तो घुसा ही नहीं है मेरा लंड।” मंगरु बोला। वह बिना किसी तेल या क्रीम के अपना लिंग मेरी गुदा से सटा कर दबाव बनाने लगा। इधर सलीम भी ठीक इसी वक्त सामने से अपना लिंग मेरी योनि के प्रवेश द्वार पर टिका कर घुसेड़ने का प्रयत्न करने लगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह नहीं।” मैं फिर चीखी।

“अबे रफीक, ठोंक इस छिनाल के मुंह में लंड। बहुत हल्ला मचा रही है रंडी कहीं की।” सलीम बोला और वही हुआ। रफीक अपना दुर्गंध युक्त लिंग मेरे मुंह के पास लाया। घृणा से मैं मुंह बंद कर दी।

.        “खोल मुंह कुतिया।” रफीक का एक जोरदार थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ा। तभी मंगरू की दानवी शक्ति से उसका विशाल लिंग, मेरी सूखी गुदा को छीलता रगड़ता फाड़ता प्रविष्ट होता चला गया। पीड़ा से चीखने हेतु मेरा मुंह खुला, किंतु मेरी चीख हलक में ही रह गयी। रफीक का दुर्गंध युक्त लिंग मेरे खुले मुंह से प्रविष्ट हो कर हलक में जा फंसा। मेरी सांसें घुटने लगीं। मैं छटपटाने लगी। यह मुसीबत मानो कम था, सलीम पिल पड़ा था अपने लिंग का प्रहार मेरी योनि में करने। बड़ी मुश्किल से सांस ले पाने में सक्षम हो पायी मैं। फिर तो सब कुछ आसान होता चला गया। वास्तव में एक साथ तीनतरफे हमले से आरंभ में मैं संभल नहीं पायी थी, यही कारण था कि कुछ परेशानी हुई। लेकिन एक बार सबकुछ सज चुकने, व्यवस्थित और संयंत होने के पश्चात मेरे साथ जो भी नोच खसोट, गुत्थमगुत्थी, या जोर अजमाईश ये दरिंदे कर रहे थे वह सबकुछ मुझे आनंद प्रदान कर रहा था। मेरी योनि में सलीम लिंग की हलचल, गुदा में बाहुबली लिंग की खलबली और मुख में रफीक लिंग का जलवा, मैं मगन मन कामुकता के सैलाब में बहती रही, डूबती रही। मुझपर टूटा करीब आधे घंटे का कहर जब शांत हुआ तो मैं मेरे तन का सारा कस बल निकल चुका था। अपने मदन रस से सींच कर मेरी कामुक देह को सिंचित करके मुझे तृप्ति प्रदान करने के दौरान तीनों दरिंदे अपनी दरिंदगी के निशान मेरे तन के कई हिस्सों पर अंकित कर चुके थे। लेकिन प्राप्त सुख के आगे उन दरिंदगी के निशानों का मुझे रंच मात्र भी गिला नहीं था। वे तीनों भी मेरी रसीली देह का रसास्वादन करते हुए मुझ पर अपनी मरदानगी झाड़ कर तृप्त, लंबी लंबी सांसें ले रहे थे।

जब हम तनिक संभले तो निचुड़े, लस्त पस्त बेडरूम से बाहर आए। अबतक बाकी सब लोग भी आपस में निबट चुके थे। मर्द लोग तो चोद चाद कर संभल चुके थे लेकिन, सोमरी और कांता की चुदी चुदाई नग्न देह अस्त व्यस्त, अर्धमूर्छित अवस्था में अब तक पड़ी हुई थीं।

“क्या हाल कर दिया है साले कुत्तों, इन लोगों का?” मैं बोल पड़ी।

“क्या किया? वही किया जो तुमलोग कर रहे थे।” बोदरा बोला।

“हमलोग जो कर रहे थे, उसके बाद भी देख लो, मैं ठीक हूं। तुमलोगों नें तो इन्हें बेहाल कर दिया है।” मैं बोली।

“तू तो साली रंडी एक नंबर की है, तेरा क्या होने वाला है।” बोदरा बोला। मेरी नजर तभी घड़ी पर पड़ी। बाप रे बाप, छ: बज रहा था। कुछ ही देर में हरिया, रामलाल वगैरह के साथ पहुंचने वाला होगा।

“ठीक है, ठीक है। बस बस, ज्यादा बोलो मत। फटाफट कपड़े पहन कर तैया हो जाओ सब। हमारे घर के बाकी नमूने आने वाले होंगे। अगर इस हालत में उन लोगों नें हमें देख लिया तो गजब हो जाएगा। आज का प्रोग्राम खतम। अब बाकी फिर कभी। और हां बाकी कहानी, उनके आने तक बताएगा हीरा। ठीक है?” मैं बोली।

“ठीक है।” सब अपने कपड़े पहनने लगे। कांता और सोमरी बड़ी मुश्किल से खड़ी हो पायीं। उनके तन को भी इन लोगों नें बड़ी बेरहमी से कुत्तों की तरह नोचा था। बुर को को कर दिया था बदहाल, चूचियों को कर दिया था लाल। सभी व्यवस्थित हो कर पुनः अपने अपने स्थान पर आसीन हो गये।

आगे की कहानी अगली कड़ी में। तबतक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।