कामिनी की कामुक गाथा (भाग 66)

अबतक रामलाल नें हमें बताया कि किस तरह रबिया की चुदाई के चक्कर में वह उस दिन फंस गया था जब चुदाई के बीच में ही उसकी बेटी शहला कॉलेज से जल्दी आ गयी थी। रामलाल को रबिया नें शहला के सामने पोल खुल जाने के भय से उसी के घर के अंदर अलमारी के पीछे नंग धड़ंग छिपने को कहकर दरवाजा खोलने चली गयी। हड़बड़ी में रामलाल के कपड़े बिस्तर पर ही छूट गये थे। इतना बता कर रामलाल रुक गया। उसकी कहानी सुनते सुनते हम सभी काफी उत्तेजित हो चुके थे। उसकी कहानी थी ही इतनी कामोत्तेजक। उसके एकदम से रुकने से एक अप्रिय विराम सा लग गया। हम सबकी उत्कंठा चरम पर थी और साथ ही हमारे अंदर की उत्तेजना भी।

“आगे?” उतावली से रश्मि बोली।

“अब आगे तेरी गांड़ चोदने के बाद।” रामलाल रश्मि को चूमकर पलटते हुए बोला।

“नहीं, गांड़ नहीं।” रश्मि घबरा गयी।

“तो जाओ, नहीं बताता। कहानी बताते बताते मेरा लंड आपकी गांड़ चोदने को तड़प उठा है। देखिए।” उसने अपने मूसल लंड पर रश्मि का हाथ रखते हुए बोला।

“हाय नहीं, प्लीज नहीं। फाड़ दीजिएगा आप।” रश्मि उसके बंधन से आजाद होने की कोशिश करने लगी। लेकिन रामलाल जैसे शक्तिशाली पुरुष के आगे वह कर भी क्या सकती थी। फड़फड़ा कर रह गयी।

“इतनी मस्त गांड़ पर तब से हाथ फेर रहा हूं, तब तक खुश थी। अब चोदने की बात पर नहीं? ऐसा कैसे होगा?” रामलाल गांड़ चोदने पर उतारू था और रश्मि राजी ही नहीं हो रही थी। इधर हम भी उत्तेजित, या तो रामलाल की आगे की कहानी, या एक दौर और चुदाई का।

“ठीक है, ठीक है, चोदिए रामलाल जी चोदिए। जल्दी चोदिए साली की गांड़ और इधर हम भी एक दौर चुदाई का चला लेते हैं। फिर कहानी बताते रहिएगा।” मैं उत्तेजना के आवेग में बोली, इस बात से बेखबर कि हरिया और करीम के मन में क्या चल रहा था। मेरे कहने की देर थी कि उधर रामलाल टूट पड़ा रश्मि पर और इधर हरिया और करीम टूट पड़े मुझ पर।

“नहीं प्लीज, मर जाऊंगी मैं।” रश्मि गिड़गिड़ाने लगी। लेकिन रामलाल को रोक पाना उसके वश की बात तो थी नहीं, बलशाली, औरतखोर पशु की तरह कहर बन कर टूटा वह। उसे पलट कर जबर्दस्ती उस पर चढ़ गया। उसकी मदमस्त चिकनी गुदा की फांक पर अपना खूंखार लिंग टिकाकर पीछे से उसकी सख्त चूचियों को बेरहमी से दबोच कर दबाव देने लगा। उसके लिंग का अग्रभाग रश्मि के मलद्वार को फैलाता हुआ करीब करीब फाड़ता हुआ फच्च से प्रविष्ट हो गया। किले के द्वार को मानो ध्वस्त कर दिया उसके मूसल नें।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह,” एक दर्दनाक चीख से गूंज उठा पूरा कमरा।

“चीखो मत, लो, घुस्स्स्स्स्स्स गया आ्आ्आ्आ्हुम्म्म्म।” रामलाल की विजयी आवाज गूंजी। एक बार उसके लिंग को रास्ता क्या मिला, घुसता ही चला गया सरसरा कर, उसकी गुदा को चीरता हुआ।

“ओ्ओ्ओह्ह्ह मां्आं्आं्आं, मर गयी रे्ए्ए्ए्ए्ए।” जिबह होती बकरी की तरह रो पड़ी बेचारी। लेकिन अब रामलाल कहां रुकने वाला था।

“आह ओह्ह्ह्ह्ह, मस्त, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, इतनी टाईट, अहा, मजा आ गया, लो पूरा घुस गया, अब रोने से क्या फायदा। चुपचाप चोदने दीजिए रश्मि मैडम। देखिए अब कितना मजा आएगा।” कहकर शुरू हो गया, गचागच चोदने लगा। कुछ देर तो रश्मि रोती कलपती रही, लेकिन कुछ लम्हों बाद उसके तेवर ही बदल गये। वचन और तन की भाषा ही बदल गयी।

“ओह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह, आह्ह आह्ह, उम्म्म्म्मा्आ्आ उम्म्म्म्मा्आ्आ, इस्स्स्स्स्स्स्स इस्स्स्स्स्स्स्स, उफ्फ्फ्फ्फ्फ चोद आमार रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, आमार गां्आं्आं्आं्आं्आं्ड़ के खूब मोजा निये चोद आमार चोदू स्वामी, आह की खूब आनोंदो दीच्छो गो, ओह रे ओह्ह्ह्ह्ह, भीषोण बांड़ा, ओह्ह्ह्ह्ह भोगोबान, भालो, भीषोण भालो लागछे गो्ओ्ओ्ओ्ओ, (मेरी गांड़ को खूब मजा ले कर चोदिए चोदू स्वामी, विशाल लंड, ओह भगवान, बहुत अच्छा लग रहा है)।

उधर रश्मि की गांड़ में रामलाल के भयावह लंड की मस्ती चढ़ी थी और इधर ये दोनों बूढ़े चुदक्कड़ इस बार मेरी गांड़ का बाजा बजाने पर उतर आए थे। हरिया ने मुझे अपने ऊपर खींच लिया और मैं भी भरभरा कर उस पर गिर ही पड़ी। इधर मैं उसपर गिरी कि आनन फानन में अपने लंड को मेरी गुदा पर टिका दिया।

“यह क्या?” चौंक उठी मैं।

“गांड़ रे पगली, गांड़ में ठोकूंगा लोड़ा्आ्आ्आ्आ।” कहते न कहते, सूखे सूखे ही जबर्दस्ती लंड घुसाने का प्रयास करने लगा। मुश्किल था, सूखे सूखे मुश्किल था, पीड़ादायक था, लेकिन उस हरामी बूढ़े को मेरी पीड़ा की क्या परवाह थी। पीड़ा देने के इरादे से ही शायद वह ऐसा कर रहा था। मैं भी ठहरी एक नंबर की रांड। दर्द के बावजूद उसके लंड को अपने में समाहित करने हेतु अपने शरीर को ढीला छोड़ दी।

“ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ मां्आं्आं्आं,” पीड़ा को यथाशक्ति पीती हुई हरिया के लंड को अपनी गांड़ में ग्रहण करने में सफल हो गयी। इतने पर ही बस थोड़ी हुई। करीम को तो भूल ही गयी थी। वह कमीना कहाँ पीछे रहने वाला था। पीछे से मुझ पर सवार हो गया और मेरी चूचियों का मलीदा बनाने पर तुल गया।

“चीख रही है कुतिया? अभी तो मैं बाकी हूं।” तभी मुझे अहसास हुआ कि करीम का तनतनाया लंड हरिया के लंड से बिंधे गुदाद्वार पर दस्तक देने लगा। चिहुंक उठी मैं।

“तू भी मादरचोद? तुझे भी मेरी गांड़ ही मिली है? आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, नननननहींईंईंईंईं, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, फट्ट्ट्ट्ट्ट जाएगी मां के लौड़े।”

“फटने दे साली रंडी। आज तेरी गांड़ का गूदा निकाले बिना हम छोड़ने वाले नहीं हैं।” दबाव बढ़ाने लगा अपने लंड का मेरी गांड़ पर। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, दो दो लंड, मेरी गांड़ में? सिहर उठी मैं। छूटने की कोई गुंजाइश नहीं थी। छूटना चाहता भी कौन था। बस भयभीत थी उस पीड़ा की जो अब मुझे झेलना था। चूत में दो लंड एक साथ सफलता पूर्वक ले ही चुकी थी तो अब गांड़ की बारी थी। चलो असंभव तो नहीं ही था, ले ही लेती हूं। इस सोच नें मेरे अंदर हिम्मत का संचार किया और लो, तभी कचकचा कर करीम नें मेरी गुदा की संकरी गुफा को चीरते हुए अपना लंड उतार ही दिया। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, अकथनीय पीड़ा। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, पल भर को मेरे जैसी रांड की भी सांसे रुक गयीं थीं। मेरी गुदा की हालत अब फटी तब फटी वाली थी। आखिर एक छिद्र, वह भी गुदामार्ग के संकरे छिद्र में, एक नहीं, दो दो मोटे मोटे लिंग को एक साथ ग्रहण करना किसी महिला के लिए कोई आसान बात तो थी नहीं, चाहे वह मुझ जैसी रांड की गुदा ही क्यों न हो। कितनी बार गुदा मैथुन से गुजर चुकी थी, किंतु इस तरह? बाप रे बाप। खैर, येन केन प्रकारेण, मैं दांत भींच कर सफलतापूर्वक इस आक्रमण को झेलने में सक्षम हो ही गयी। अब आरंभ हुई मेरी गुदा की कुटाई। दोनों बूढ़ों में मानो होड़ लग गयी मेरी तंग गुफा को कूटने की। उफ्फ्फ्फ्फ्फ भगवान, जालिमों ने मेरे जिस्म को निचोड़ते हुए मेरी गुदा पर कहर ही ढा दिया। भकाभक, भचाभच लगे चोदने मेरी गुदा को। प्रारंभिक पीड़ा का दौर गुजरने के पश्चात, ओह्ह्ह्ह्ह मां्आं्आं्आं, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, आनंद, सुखद आनंद में मुदित, चुदने लगी।

“ओह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, चोद बेटीचोओ्ओ्ओ्ओ्ओदों, चोद बेटी की गां्आं्आं्आं्आं्आं्ड़, उफ्फ्फ्फ्फ्फ मजा आ रहा है साले कुत्तों, उफ्फ्फ्फ्फ्फ।” मैं जहाँ अनाप शनाप बड़बड़ाती कुतिया की तरह चुदने में मशगूल थी वहीं दोनो बूढ़े भी मुझे गंदी गंदी गालियों से नवाजते हुए चोदे जा रहे थे।

“हरामजादी कुतिया, रंडी की चूत, मां की लौड़ी, ले ले ले ले और ले आह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह, लंडखोर बुरचोदी……” और न जाने क्या क्या। रामलाल की उत्तेजक कहानी का असर था यह। हम सभी कामुकता के सागर में डूब उतरा रहे थे। सभी अपने अपने ढंग से अपनी वासना की तृप्ति हेतु जी जान से प्रयासरत थे। एक दूसरे के तन से ऐसे लिपट चिपट रहे थे, बदहवासी, बेकरारी के आलम में डूबे ऐसे धकमपेल कर रहे थे मानो सारी कसर आज ही पूरी करने पर आमादा हों। करीब पच्चीस तीस मिनट के वासना की उस आंधी में हम सभी बेलगाम, पूरी बेशरमी से बहे जा रहे थे बहे जा रहे थे। उस आंधी के थमते ही मैं और मेरी गांड़ का कचूमर बनाने वाले दरिंदे बूढ़े इधर उधर लुढ़के अपनी सांसों पर नियंत्रण करने की कोशिश करने लगे। मुझे अहसास हो रहा था कि मेरा मलद्वार फैल कर गुफा में तब्दील हो चुका था जिसमें से इन बूढ़ों का वीर्य रिस कर बाहर आ रहा था। मैं बड़ी मुश्किल से उठी और बाथरूम की ओर चली, धुलाई करने, रोक पाने में अक्षम, अपनी गुदा से निकलते मल मिश्रित वीर्य की धुलाई करने। मेरे वापस आते आते रामलाल भी रश्मि की गांड़ का भुर्ता बना कर एक ओर लुढ़का भैंसे की तरह डकार रहा था। रश्मि की हालत तो देखने लायक थी। पेट के बल निढाल पड़ी, अपने गांड़ की बरबादी का दर्शन करा रही थी। थक कर चूर, पीले पीले मल लिथड़े नितंबों से बेखबर, आंखें बंद किए पता नहीं किस दुनिया की सैर कर रही थी।

“अरी रश्मि, उठ, जा कर अपनी गांड़ धो कर आ।” मैं बोली।

“ऊं्ऊं्ऊं्ऊं्ऊं्ह्ह्ह्ह्ह्ह,”

“उठ”

“क्यों ््ओओंं््ओओंं््ओओंं?”

“तेरी गांड़ गू से सनी है।”

“ओह्ह्ह्ह्ह भगवान, क्या हाल हो गया।” अपने हाथ के स्पर्श से यह महसूस करके कि मैं सच कह रही हूँ, बड़ी मुश्किल से अलसाई सी लड़खड़ाते हुए उठी और बाथरुम की ओर चली। उसका गुदाद्वार फैल कर संकुचन की क्रिया द्वारा पेट के अंदर मल के दबाव को रोक पाने में असफल सिद्ध हो रहा था, नतीजतन, बाथरूम जाते जाते उसकी गांड़ से टप टप मल और वीर्य का मिश्रित द्रव्य फर्श पर चूता चला गया, जिसे मुझे ही साफ करना पड़ा। रश्मि जब वापस कमरे में आई, तबतक हम सब सामान्य है चुके थे। शरीर लेकिन हम सबके अब भी नग्न ही थे।

“आया मजा?” मैं रश्मि से पूछी।

“आया, बड़ा मजा आया, लेकिन शुरु में रुला ही दिया था हरामी नें तो मुझे।” पूर्ण संतुष्टि का भाव था उसके चेहरे पर। लेकिन उसकी चाल बदली बदली सी थी। होगी भी क्यों नहीं, इतने मोटे और लंबे लंड से जो गांड़ मरवा बैठी थी।

“हां, सच बोल रही हो, इन खड़ूस बूढ़ों को देखो, इनके लंड कैसे अभी चूहे की तरह दुबके हुए हैं, कुछ देर पहले मेरी गांड़ के अंदर गरज बरस कर मेरी गांड़ का फालूदा बना रहे थे साले चुदक्कड़।” मैं बोली, और वे दोनों बूढ़े हमें देख कर खींसे निपोर रहे थे।

“तो अब?” मैं पूछी।

“अब क्या?” रश्मि बोली।

“अरी, शहला वाली कहानी।”

“ओह हां। तो मेरे प्यारे चुदक्कड़ जी, चलिए, शुरू हो जाईए।” रामलाल की ओर देखते हुए नंग धड़ंग सोफे पर बेशर्मी के साथ बैठती हुई बोली।

रामलाल अलसाई मुद्रा में उठते हुए बोला, “बताता हूं, बताता हूं।” फिर रश्मि को अपनी बांहों में दबोच कर बोलने लगा:… …..

शहला वाली कहानी अगले भाग में। तबतक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।

रजनी

[email protected]

Comments

Published by

Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।