कामिनी की कामुक गाथा (भाग 29)

पिछली कड़ी में आपलोगों ने पढ़ा कि किस तरह मेरे नाना के घर में मेरे दादाजी, बड़े दादाजी, हरिया, करीम, नानाजी, पंडितजी, मेरी मां, चाची और मुझे मिलाकर कुल नौ लोगों के बीच किस तरह वासना का नंगा खेल चला। उसके बाद आगे:-

जैसा कि तय हुआ था, नहा धो कर नाश्ता करने के पश्चात मां घर लौट गयी। दादाजी और बड़े दादाजी हजारीबाग चले गए। पंडित जी भी अपने घर चले गये, लेकिन जाते वक्त आंखों ही आंखों में पंडित जी मुझ से काफी कुछ कह गए। मेरा दिल बाग बाग हो उठा, यह जान कर कि हमारी मुलाकातें जारी रहेंगी। बाकी सारे लोग अपने अपने काम में व्यस्त हो गए। चाची भी अपने घर चली गयी। वह यहां से ज्यादा दूर नहीं थी, सो पैदल ही जाने को तत्पर हो गई थी, लेकिन नानाजी ने करीम से कहा कि उसे घर छोड़ दे। करीम ने गाड़ी निकाली और चाची को उनके घर छोड़ आए। यहां तक की कहानी सुनाने के बाद कामिनी रुक कर मेरे चेहरे की ओर गौर से देखने लगी। दर असल कामिनी जब अपनी जीवनी के पन्ने मेरे सामने पलट रही थी उस वक्त उसने जिस तरह पंडित जी का जिक्र किया था उसे सुन कर मैं भी रोमांचित हो उठी थी। हालांकि मैं, रजनी, एक पारिवारिक, पतिव्रता, शादीशुदा, दो बच्चों की मां हूं, किंतु हूं तो एक इंसान ही। इंसानी कमजोरियों से युक्त, जिसके मन के चाह की कोई सीमा नहीं होती। सामाजिक बंधनों से बंधे होने के बावजूद सभी के मन में काफी कुछ अनैतिक चलता रहता है, जिसे हर इंसान को दबा कर जीना पड़ता है वरना यह समाज रुपी संस्था कब का छिन्न भिन्न हो गया होता। मैं कितनी कामुक हूं यह सिर्फ मेरे पतिदेव राजेन्द्र जी को ही पता है। मेरी वासना की आग को मेरे पति कभी कभी अनबुझा छोड़ देते थे, लेकिन फिर भी मुझे कोई शिकायत नहीं थी क्योंकि कम से कम मुझ जैसी स्त्री के लिए एक पति और परिवार रुपी सुरक्षा तो थी। अपनी तमाम कमजोरियों और यौनेच्छा के बावजूद मैं कामिनी की तरह इतनी आजाद खयाल भी नहीं हूं (समाज का भय, जिसकी जंजीर में जकड़ी 95% भारतीय स्त्रियां जी रही हैं) कि किसी भी मर्द के सम्मुख अपनी काम पिपाशा शांत करने हेतु बिछ जाऊं, किंतु पंडित जी के बारे में कामिनी के मुख से जो कुछ सुना, उसके विस्तृत चित्रण ने मेरी योनी को गीला होने मेंं मजबूर कर दिया। मैं तन्मयता से कामिनी की कामगाथा सुनते हुए सोफे पर बैठी बैठी कसमसाने लगी। मैं खुद पर चकित थी कि पर पुरुष के बारे में सुन कर मुझ जैसी सीधी सादी 40 वर्षीय गृहिणी को यह क्या हो रहा है। मेरे शरीर पर मानो चींटियां रेंग रही हों। मेरा चेहरा लाल भभूका हो गया और मेरी सांसें धौंकनी की तरह चलने लगी थी। अनायास और बेध्यानी मेंं मेरा हाथ सलवार के ऊपर से ही मेरे गुप्तांग के स्थान पर चला गया। कामिनी की अनुभवी आंखों से मेरी हालत छिपी न रह सकी और उसके होंठों पर रहस्यमयी मुस्कान थिरकने लगी। इस वक्त हम कामिनी के वृद्धाश्रम में बैठे बातें कर रहे थे। (दरअसल आज की तारीख में कामिनी एक वृद्धाश्रम चला रही थी और उसके नाना, दादा, बड़े दादा गुजर चुके थे। माता पिता भी बूढ़े हो चले थे। एकमात्र भाई अपने आवारा दोस्तों की सोहबत में पड़कर अपराध की दुनिया में कदम रख चुका था और दो बार जेल की हवा भी खा चुका था। हरिया और करीम भी काफी बूढ़े हो चुके थे और यहीं वृद्धाश्रम की देख भाल मेंं कामिनी का हाथ बंटा रहे थे।)

मेरी स्थिति पर कामिनी कुटिलता पूर्वक मुस्कुराते हुए बोली, “क्या हुआ रजनी, मेरी बातों से तुम बोर हो रही हो क्या?”

“नहीं ऐसी बात नहीं, दरअसल…..” इसके आगे मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या बोलूं। मैं समझ गई कि कामिनी ने मेरी स्थिति को भांप लिया है। झेंप कर मैंने नजरें झुका लीं।

(कामिनी से मेरी दोस्ती के सिर्फ दो ही साल हूए थे। मैं कामिनी के नानाजी के घर से कुछ ही दूर में रहती थी, अपने छोटे से परिवार के साथ। यह एक संयोग था जब मैं बाजार से घर आने के लिए किसी वाहन का इंतजार कर रही थी और उसी वक्त कामिनी वहां से अपनी कार में गुजर रही थी, उसने मुझे लिफ्ट दिया और वहीं से हमारी दोस्ती परवान चढ़ती गई। कामिनी और मेरे व्यक्तित्व में कोई समानता नहीं थी। कहाँ वह 51 वर्ष की उम्र में भी दपदपाती 35 वर्षीय दिखने वाली खूबसूरत, तेज तर्रार, स्मार्ट, स्वछंद विचारों वाली, आत्मविश्वास से ओतप्रोत स्त्री और कहां मैं 40 वर्षीय, सांवली, 5′ 4″ कद की भरे बदन वाली घरेलु औरत। हालांकि मेरे नाक नक्श आकर्शक थे, फिर भी मेरी कामिनी के साथ कोई तुलना ही नहीं थी। इन दो सालों में हम दोनों काफी घुल मिल गई थीं। हमारे बीच उम्र का फासला ग्यारह साल का था लेकिन हम दोनों के बीच सहेलियों वाला खुला रिश्ता पनप चुका था, इस कारण कामिनी ने अपने जीवन के एक एक पन्ने को मेरे सामने खोल कर रख दिया था। उसे मुझ पर पूरा विश्वास था। मैं अक्सर उसके वृद्धाश्रम में जाती रहती थी। करीब पैंतीस वृद्ध बेघर स्त्रियां और पुरुष वहां रहते थे। जिनमें दस स्त्रियां और पच्चीस पुरुष थे। कामिनी ने अपनी सोच के अनुसार सबको खुली आजादी दे रखी थी स्वतंत्रता पूर्वक जीने के लिए। कोई सामाजिक बंधन नहीं था। यौनाचार मेंं सक्षम जितने भी लोग वहां थे, आपस में खुल कर यौन संबंध का आनंद लेने को स्वतंत्र थे। उनमें से करीब सभी मर्दों के साथ कामिनी के शारीरक संबंध थे। कुछ को कामिनी ने खुद अपने आकर्षण के जाल में फंसा कर अपना तन परोसा और कुछ वृद्धों की लार टपकाती कामलोलुप नजरों में अपने लिए अव्यक्त भूख को भांप कर, न चाहते हूए उनकी इच्छा का मान रखने के लिए उनकी हवस मिटाना अपना कर्तव्य समझ कर। वृद्धा स्त्रियों (ढलती उम्र की गठी हुई या थुलथुल देह वाली) को भी अपनी कामक्षुधा शांत करने के लिए किसी भी मर्द की हमबिस्तर होने में कोई संकोच नहीं था। सबके रहने की काफी अच्छी व्वस्था थी। बिल्कुल घर वाला माहौल बना कर रखा था कामिनी ने। यह वृद्धाश्रम उसके नानाजी के बड़े से भूभाग पर बना हुआ था, कामिनी के प्रभाव के कारण किसी भी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप या संकटों से निरापद।)

इसके बाद की घटनाएं इस तरह थीं, कामिनी की जुबानी –

मेरा एडमीशन महिला कॉलेज रांची में हो गया। मैं कॉमर्स की पढ़ाई करने लगी। बीच बीच में दादाजी और बड़े दादाजी मुझसे मिलने आ जाते थे और अपनी वासना की भूख मिटा कर लौट जाते थे। यहां नानाजी के साथ हरिया और करीम तो थे ही मेरे साथ पति धर्म निभाने को। बीच बीच में मैं पंडित जी से भी रंगरेलियां मना लेती थी। तभी एक अनहोनी हो गई जिसने मेरी जिंदगी में एक नया मोड़ ले आया। अभी दो ही महीने हुए थे यहां रहते हुए कि मेरी माहवारी बंद हो गई। शंका के समाधान के लिए मेरा चेकअप हुआ तो पता चला कि मैं गर्भवती हो चुकी हूं। हालांकि मैं नानाजी के यहां सामुहिक पत्नी के रुप में रह रही थी किंतु समाज इस शादी को अनैतिक मान कर खारिज कर देता। फलस्वरूप बदनामी के डर से नानाजी ने सबसे सलाह मश्वरा करके भरे मन से मुझे एक सरकारी क्लर्क के पल्ले बांध दिया। मात्र सात महीने बाद ही मैं ने एक पुत्ररत्न को जन्म दिया जिसे डाक्टर ने प्री मैच्योर बेबी कह कर मुझे कलंकिनी कहलाने से बचा लिया। इसके बाद की कहानी आप लोग कहानी की शुरुआत में पढ़ चुके हैं। पति की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात सास की प्रताड़ना से आजिज आ कर मैं ने ससुराल छोड़ दिया और नानाजी के यहां आ कर रहने लगी और अपनी पढा़ई लिखाई पूरी की। नानाजी के घर से वैसे भी मेरा नाता पहले से था। अब मैं कहीं नौकरी ज्वॉईन करके अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी साथ ही साथ मेरी कामुकता को यथाशक्ति नियंत्रण मेंं रखना चाहती थी जो समय के साथ साथ और भी धधकती जा रही थी। मेरी वासना की भूख पहले से और बढ़ गई थी जिसे बूढ़े होते जा रहे मेरे तथाकथित पतियों और पंडित जी से मिटाती आ रही थी।

फिर एक और संयोग ने मेरी जिंदगी में एक और नया मोड़ ला दिया। मेरी कॉलेज की पढा़ई खत्म होने के तुरंत बाद ही एक दिन बाजार में उसी हब्शी से मुलाकात हो गई जिसकी अंकशायिनी बनने के लिए एक कमीने सरदार ने मुझे ब्लैकमेल करके मजबूर किया था।

मैं बच कर निकलना चाहती थी कि उन्होंने मुझे टोक दिया, “Hi, how are you baby?” (हाय कैसी हो बेबी)

“I’m fine sir.” (मैं अच्छी हूं श्रीमान) मैं झिझकते हुए बोली।

“What happened? Don’t be afraid of me. I kicked the sardar out of my office, when I came to know about the whole story of that night. I don’t like to exploit the helpless person. I regret for that incident) ” (क्या हुआ? मुझसे डरो मत। जब मुझे सरदार से उस रात की बात पता चली तो उसे नौकरी से निकाल दिया। मुझे किसी की मजबूरी का फायदा उठाना पसंद नहीं। मुझे उस दिन की घटना पर खेद है)

मैं थोड़ी आश्वस्त हुई। उनके चेहरे पर खेद और अपराधबोध का भाव था। “No need to feel sorry for that incident sir. I had already taught him the lesson for his act” (उस घटना के लिए दुखी होने की आवश्यकता नहीं है स्रीमान। मैं ने उसी वक्त उसके कुकृत्य के लिए उसे सबक सिखा दिया था) मैं बोली।

फिर उन्होंने मेरे चेहरे को गौर से देखते हुए मुझ से कहा, “You look a bit worried. What’s the matter? It would be my pleasure if I could help you.” (तुम कुछ चिंतित नजर आ रही हो। क्या बात है? अगर मैं किसी तरह तुम्हारी सहायता कर सकूं तो मुझे खुशी होगी।)

मैं ने जवाब दिया, “Sir, I’m desperately searching a job to lead independent life.” (श्रीमान मैं स्वावलंबी होने के लिए बड़ी शिद्दत से एक नौकरी की तलाश में हूं।)

“What a coincidence, I also need an office assistant. It will be my pleasure to give you that post.” (क्या संयोग है, मुझे भी एक ऑफिस असिस्टेंट की जरूरत है। यह पद तुम्हें देकर मुझे खुशी होगी)

इस तरह एक सुखद संयोग ही था जिससे मुझे एक अच्छी नौकरी भी मिल गई। मैं ऑफिस असिस्टेंट से तरक्की करते करते उपप्रबंधक के पद तक पहुंच गई। इसमें मेरी काबीलियत के साथ साथ मेरी कमनीय काया और मेरी कामुकता का भी बड़ा योगदान था। वह हब्शी रिचर्ड ऐग्न्यू तो मुझ पर खासा मेहरबान था, हालांकि मेरी काबीलियत पर उसे जरा भी संदेह नहीं था, जिसका प्रमाण मैंने कई मौकों पर दिया। मैं कई बार उनकी हमबिस्तर बनी और खुशी खुशी बनी, पूरी रजामंदी से। उन्होंने कभी भी मुझसे जबर्दस्ती नहीं की। वे मुझसे आग्रह करते और मैं खुशी खुशी उनकी आगोश में चली जाती थी और पूरे समर्पण के साथ उनकी और खुद की हवस की आग बुझाती थी। कई बार तो हमने उनके ऑफिस में ही वासना का खेल खेला। वे अपनी घूमने वाली कुर्सी पर बैठे रहते थे, वे मुझे अपनी गोद में बैठा कर चूमते थे। मेरी टॉप के बटन खोल कर मेरी चुचियों को सहलाते थे। अपने मुंह में भर कर मेरी तनी हुई चूचियों को चूसते थे। मैं उनके पैंट की जिप खोल कर अपने हाथ से उनके गधे सरीखे लिंग को पकड़ कर सहलाती थी और खेलती थी। जब कमाग्नि दोनों तरफ बराबर भड़क चुकी होती थी तो मेरी स्कर्ट को धीरे धीरे से ऊपर उठा लेते थे और मेरी पैंटी को नीचे खिसका कर पनिया चुकी योनी में अपने विशाल लिंग को प्रवेश कराने के पश्चात मुझे किसी गुड़िया की तरह कमर से पकड़ कर बैठा लेते थे। तब तक का सबसे विशाल खौफनाक लिंग, जिससे उन्होंने पहली बार उस कमीने सरदार की ब्लैकमेलिंग के माध्यम से परिचित कराया था, पहली बार जो भारतीय स्त्री देख ले वही खौफजदा हो जाए, (हब्शी लिंग से उस दर्दनाक प्रथम संभोग, जिसके स्मरण मात्र से कई दिनों तक मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ जाती थी) ऐसे लंबे और मोटे लिंग को अपनी योनी में पूर्णतयः समा लेती थी और उसी कुर्सी पर संभोग में लीन हो जाती थी। पीछे से मेरे उरोजों को सहलाते हुए, दबाते हुए, वे मेरी कमनीय काया का भोग लगाते थे। मैं इन सबमें पूरे दिल और मन से उनका सहयोग करती हुई संभोग के अखंड आनंद में डूब जाती थी। मैं उसके विशाल शरीर और विकराल दस इंच लंबे और गधे जैसे मोटे लिंग से मैथुन की अभ्यस्त हो चुकी थी।

ऐसा नहीं था कि मेरे आकर्षक व्यक्तित्व और हमारे अनैतिक संबंधों की वजह से ही मुझे आज इस महत्वपूर्ण पद पर आसीन होने का अवसर मिला, बल्कि मेरी कुशाग्र बुद्धि और कुशल प्रबंधन का लोहा भी मैं मनवा चुकी थी। इन्हीं कारणों से वे हमेशा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मीटिंग अटेंड करने के लिए वह मुझे ही लेकर जाते थे। होटलों में एक ही कमरे में हम ठहरते और पूरी स्वतंत्रता के साथ, दिल खोल कर, विभिन्न तरीकों से वासना की प्यास बुझाया करते थे। हमारे बीच एक ऐसा संबंध था जो व्यवसायिकता के साथ भावनात्मक भी था। हम दोनों एक दूसरे की भावनाओं का आदर करते थे।

इसके बाद की कथा अगली कड़ी में।

तबतक के लिए अपनी कामुक लेखिका रजनी को आज्ञा दीजिए।

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।