कामिनी की कामुक गाथा (भाग 23)

मेरे प्रिय सुधी पाठकों,

पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह मेरे बड़े दादाजी ने मेरे पिताजी के साथ समलैंगिक संबंध स्थापित किया। मेरे पापा समलैंगिक संभोग (गुदा मैथुन) के अभ्यस्त थे और इस तरह की कामुक गतिविधियों में शामिल हो कर खूब आनंद उठा रहे थे। उनकी इसी कमजोरी का लाभ उठा कर बड़े दादाजी ने जमशेदपुर में एक विवाह समारोह में भाग लेने के दौरान बड़ी सहजता से उन्हें अपनी वासना का शिकार बना डाला और उनकी कमनीय देह का लुत्फ उठाया। मेरे पापा ने भी बड़े दादाजी के पौरुष और पुष्ट लिंग के संपर्क से जो आनंद प्राप्त किया, वह उनके लिए अभूतपूर्व था। वे बड़े दादाजी के दीवाने हो गए। पुरुष होने के बावजूद मेरे पापा के अंदर स्त्रियों की भांति पुरुषों के साथ संसर्ग का सुख उठाने की प्रवृति स्कूली जीवन से ही आ गई थी। वे काफी कम उम्र से ही गुदा मैथुन के आदी हो चुके थे। अब आगे दादाजी बोलने लगे, “मैं ने जब अशोक से पूछा कि उसके अंदर यह प्रवृत्ति कब से और कैसे आया, तो जिस कमरे में वे ठहरे थे, उसी कमरे में मेरे और अपने मित्र रमेश, जो खुद भी काफी समय से अशोक की गांड़ चुदाई का मज़ा लेता आ रहा था, के सामने अशोक ने बताना शुरू किया : –

“मैं बचपन से ही काफी खूबसूरत था, इसलिए स्कूल के सभी शिक्षक मुझे बहुत प्यार करते थे। कुछ मेरे गाल को नोचते थे तो कुछ मेरे गाल को चूम लेते थे। मैं बहुत शर्मीला किस्म का लड़का था। लड़के भी मुझे लड़कियों की तरह छेड़ते रहते थे इसलिए मैं लड़कों से दूर ही रहना पसंद करता था और लड़कियों के साथ ही रहना पसंद करता था। यह उस समय की बात है जब मैं नौवीं क्लास में पढ़ता था। मेरी उम्र उस समय पंद्रह साल थी। मेरे पापा ने कहा था कि अगर वार्षिक परीक्षा में मैं 85% से कम नंबर लाया तो उनसे बुरा कोई नहीं होगा। मुझे बदकिस्मती से सिर्फ 84% नंबर मिला। मैं पिताजी के डर से छिप कर घर में घुसा और स्कूल बैग घर में रख कर अपने गुल्लक में जो भी पैसे थे, ले कर चुपचाप बाहर निकल आया और सीधे स्टेशन पहुंच गया और ट्रेन से हावड़ा चला गया। हावड़ा पहुंचते-पहुंचते मुझे जोरों की भूख लगी तो मैं सड़क पार करके सामने जो होटल मिला, उसके सामने खड़ा हो कर सोच रहा था कि क्या खाऊं। उस समय रात हो चुकी थी और करीब आठ बज रहा था। मैं वहां खड़ा सोो ही रहा था कि इतने में मेरी ही उम्र का एक लड़का, जो शायद उसी होटल में काम करता था, मेरे पास आया और बोला, “ओय, तू यहां क्या देख रहा है? चल तुझे मालिक बुला रहा है।” मैं ने नजर उठा कर सामने देखा, मिठाईयों के शोकेस के ठीक पीछे कुछ ही दूर अंदर में टेबल के पीछे एक कुर्सी में एक करीब पचास साल का काला कलूटा मोटा आदमी बैठा हुआ था और इशारे से मुझे बुला रहा था। टकला, खुरदुुुुरी दाढ़ी, पकोड़े जैसी नाक, गुब्बारे जैसे फूले हुए गाल, कानों पर लंबे लंबे बाल, पान खा खा कर लाल मोटे मोटे होंठ और आड़े टेढ़े पीले पीले दांत, कुछ मिला कर निहायत ही कुरूप और अनाकर्षक।

मैं डरते डरते उनके सामने गया तो बड़े प्यार से पूछा, “बेटे कहां से आए हो?”

“जी मैं घाटशिला से आया हूं”, मैं बोला।

“अकेले हो?” उन्होंने पूछा।

“जी,” मैं बोला।

“क्या नाम है बेटा?” उन्होंने पूछा।

“जी अशोक”, मैं बोला।

“कहां जाना है?” वह पूछा, जिसपर मैं चुप रहा। वह शायद समझ गया कि मैं घर से भाग कर यहां आया हूं। फिर बड़े प्यार से पूछा, “भूख लगी है?”

“जी,” मैं बोला।

“क्या खाओगे?” उसने पूछा जिस पर मैं फिर चुप रहा।

फिर वह उसी लड़के की ओर मुखातिब हुआ जो मुझे बुलाया था और बोला, “अरे मुन्ना, अशोक को ले जा कर गरमागरम रोटी और तड़का खिलाओ। जाओ बेटा मुन्ना के साथ,” ऐसा कहते हुए उसकी आंखें चमक रही थीं।

मुन्ना मुझे लेकर एक कोने वाले खाली टेबल पर आया और मुझे वहां बैठा कर गरमागरम रोटी और तड़का ला कर मेरे सामने देते हुए कहा, “क्या बात है भाई, मालिक तुम पर बहुत मेहरबान है? क्या वे तुम्हें पहले से जानते हैं?”

मैं ने उसकी ओर देखा और बोला, “नहीं तो।”

“फिर क्या बात है भाई?” वह अब मुस्करा रहा था।

“पता नहीं।” मैं बोला और खाने पर टूट पड़ा, मुझे भूख ही इतनी लगी थी।

जब मैं पेट भर कर खा चुका तो होटल का मालिक उठ कर मेरे पास आया और बोला, “अब तुम कहां जाओगे बेटे?”

मैं असमंजस में था कि क्या बोलूं, तभी वह बोल उठा, “कोई बात नहीं, तुम यहीं रह जाओ, तुम्हारे रहने की व्यवस्था मैं यहीं कर देता हूं। मेरा नाम छगनलाल है। तुम मुझे छगन अंकल बोल सकते हो। मुन्ना, कल्लू और रामू यहां इसी होटल में रहते हैं, तुम भी यहां रह सकते हो। अरे मुन्ना, जरा कल्लू को बोलो, अशोक के सोने की व्यवस्था ऊपर वाले तल्ले में कर दे, मेरे बिस्तर के बगल में ही एक बिस्तर और लगा देना इसके लिए।” मुन्ना तुरंत वहां से चला गया और कुछ ही देर में अपने नाम के अनुरूप काला सा छरहरे बदन का मेरी ही उम्र का लड़का कल्लू आ कर बोला, “मालिक, बिस्तर तैयार है।”

“ठीक है, तुम अशोक को ऊपर ले जा कर उसका बिस्तर दिखा दो, जाओ बेटा कल्लू के साथ।” वह मुझसे बोला। मैं कल्लू के पीछे पीछे चल पड़ा और लकड़ी की सीढ़ियों से होता हुआ ऊपर वाले तल्ले पर पहुचा तो देखा, ऊपर वाला तल्ला कोई कमरा नहीं बल्कि पूरा का पूरा तल्ला बड़ा सा हॉल की तरह था जिसके उत्तर की ओर दो चौकियां आस पास पूरब पश्चिम दिशा में लगी हुई थीं जिन पर साफ चादर बिछे हुए थे। सिरहाना पूरब की ओर था। उत्तर पूर्व कोने में एक टेबल और कुर्सी था।

सबसे किनारे वाले बिस्तर की ओर इशारा करके वह बोला, “यह मालिक का बिस्तर है और बगल वाला बिस्तर तुम्हारा है। तुम उस पर सो जाओ, मालिक इस बिस्तर पर सो जाएंगे” इतना कहकर वह नीचे चला गया। जाते वक्त मुझे ऐसा लगा मानो वह अपनी मुस्कराहट छिपाने की कोशिश कर रहा हो। । खैर मैं ने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और अपने बिस्तर पर लेट गया। थका हुआ तो था ही, लेटने के तुरंत बाद ही मुझे गहरी नींद आ गई। रात को करीब दस बजे अचानक मुझे ऐसा लगा मानो किसी ने मेेे गांड़ में चाकू घुसेड़ दिया हो। दर्द के मारे मैं तड़प उठा और मेरी नींद खुल गई। मैं दर्द के मारे चीखने के लिए मुंह खोला लेकिन चीख मेेे मुंह में ही दबी रह गई, क्यों कि मेेंरा मुंह किसी के मजबूत हाथों से बंद था। मुझे इस बात का भी आश्चर्य हो रहा था कि मेरे बदन में कोई कपड़ा नहीं था और मैं बिल्कुल नंगा था। मैं पेट के बल लेटा हुआ था और मेरे ऊपर कोई चढ़ा हुआ था जिसने एक हाथ से मेरा मुंह बंद कर रखा था और दूसरे हाथ से मेरी कमर को जकड़ रखा था। मैं अपने हाथों से मेरे मुंह में सख्ती से कसे हुए हाथ को हटाने की कोशिश करने लगा लेकिन वह हाथ जैसे किसी दानव का हाथ था, टस से मस नहीं हुआ। मैं बेबसी में पैर पटकने लगा और मेरी गांड़ से उठते हुए अकथनीय पीड़ा से मेरी आंखों में आंसू आ गए।

उसी समय मेरे कानों में आवाज आई, “शांत रहो बेटा, छटपटाओ मत, कुछ ही देर में तेरा दर्द खत्म हो जाएगा।” यह होटल के मालिक की आवाज थी। मैं कांप उठा। तो इसका मतलब मेरे ऊपर छगन अंकल चढ़ा हुआ था। मैं एक हाथ मेरी गांड़ की तरफ ले गया तो मेरा दिल धक्क से रह गया। उस भैंस जैसे छगन अंकल का करीब तीन ढाई इंच मोटा लंड मेरी गांड़ में आधा घुसा हुआ था। मुझे कुछ चिपचिपा सा महसूस हुआ, शायद वैसलीन जैसा कुछ तैलीय पदार्थ का इस्तेमाल उसने मेरी कसी हुई कुंवारी गांड़ में अपना मोटा लंड डालने के लिए किया था। वह पूरा नंगा मुझ पर इस तरह सवार था कि मैं हिल भी नहीं पा रहा था। ऐसा लग रहा था मानो कोई भैंस किसी बकरी को चोद रहा हो। मैं अपनी बेबसी पर सिर्फ आंसू बहा सकता था। गनीमत यह था कि उसने अपने बदन का पूरा बोझ मुझ पर नहीं डाला था, वरना उसके राक्षस जैसे शरीर के बोझ से मैं तो मर ही जाता। कुछ देर वह उसी तरह स्थिर रहा तो मुझे थोड़ी राहत मिली लेकिन अभी भी मेरी गांड़ फटने फटने को हो रही थी।

“देखो बेटे, मैं अपना हाथ तेरे मुंह से हटा रहा हूं लेकिन तुम चिल्लाना मत वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।” उसने कहा और अपना हाथ मेरे मुंह से हटा लिया। मैं पूरी तरह दहशत में आ गया और अपना हाथ पैर ढीला छोड़ दिया। “ओह मां, आह्ह्ह प्लीज अपना लंड मेरी गांड़ से निकाल लीजिए, मैं मर जाऊंगा।” मैं कराहता हुआ बोला।

“तू शांत रहेगा तो तुझे कुछ नहीं होगा। थोड़ा दर्द बर्दाश्त कर ले फिर तुझे बहुत मजा आएगा बेटा।” कहते हुए वह मेरी गांड़ में लंड फंसाए हुए मेरी कमर पकड़ कर मुझे थोड़ा ऊपर उठा लिया और हाथों और घुटनों के बल चौपाए की तरह करके मेरे पीछे से आपने लंड का दबाव बढ़ाने लगा।

जैसे जैसे उसका लंड घुसता जा रहा था मेरी गांड़ का सुराख फैलता जा रहा था और मैं दर्द की अधिकता से रोने और गिड़गिड़ाने लगा, “और नहीं डालिए ओह ओ्ओ्ओ्ओह मां मर जाऊंगा, आह मेरी गांड़ फट रही है, छोड़ दीजिए ना प्लीज।” मेरे रोने गिड़गिड़ाने का उस जालिम पर कोई असर नहीं हुआ और पूरा लंड मेरी गांड़ में घुसा ही दिया। ऐसा लग रहा था मानो उनका लंड मेरे गुदा द्वार से लेकर अंतड़ियों तक ठोंक दिया गया हो। “देख बेटा, मेरा पूरा लौड़ा तेरी गांड़ में घुस गया है, तेरी गांड़ फटी क्या? नहीं ना? थोड़ा सब्र कर, सब ठीक हो जाएगा।” वह मुझे सांत्वना देते और पुचकारते हुए बोला। मुझे तो अभी भी मेरी जान निकली सी महसूस हो रही थी, मेरी आंखों से अभी भी आंसुओं की धारा बह रही थी। पूरा लंड घुसा कर वह कुछ पलों के लिए रुक गया, फिर धीरे धीरे बाहर करने लगा। जैसे जैसे बाहर निकल रहा था ऐसा लग रहा था मानो मेरी गांड़ के अंदर खालीपन (शून्यता) आ गई हो और मैं ने राहत की लंबी सांस लेने लगा किंतु यह अहसास क्षणभंगुर था। पुनः उस कसाई ने वही क्रिया दोहराई और पूरा लंड दुबारा डाल कर रुक गया। इस बार उसने मुझे एक हाथ से संभाला हुआ था और दूसरे हाथ से पहले मेरे सीने के उभारों को सहलाने लगा और फिर धीरे धीरे दबाने लगा। फिर वहां से हाथ हटा कर मेरे लंड को सहलाने लगा और मुट्ठी में लेकर मूठ मारने लगा। मुझे यह सब बहुत अच्छा लग रहा था और मैं धीरे धीरे मस्ती में भर गया और भूल गया कि उनका लौड़ा मेरी गांड़ में घुसा हुआ है।

“आह ओह ओ्ओ्ओ्ओह उफ्फ” मैं मस्त हो कर आहें भरने लगा। उस कमीने की समझ में आ गया कि अब मैं दर्द को भूल कर मूठ मरवाने के आनंद में डूब गया हूं तो फिर एक बार लौड़ा निकाल कर घप्प से लंड का प्रहार कर दिया। “आह्ह्ह्ह्ह्” इस बार मैं ने थोड़ा सा ही दर्द महसूस किया। फिर वही क्रिया बार बार दुहराने लगा, पहले धीरे धीरे, फिर वह धक्कों की रफ़्तार बढ़ाता चला गया। अब मैं सारा दर्द भूल गया था। मैं मूठ मरवाने के आनंद में इतना खो गया कि कब मेरी गांड़ चुदते चुदते ढीली हो गई मुझे पता ही नहीं चला। करीब पांच मिनट में ही थरथराने लगा और आंखें बंद कर आनंद के सागर में गोते खाने लगा और “आ्मैंआ्आ्आ्ह्ह्ह्ह” चरमोत्कर्ष के अकथनीय आनंद में सराबोर होकर झड़ने लगा, फिर खल्लास हो कर ढीला पड़ गया। मेरे जीवन का वह पहले स्खलन का अद्भुत चिरस्मरणीय आनंदमय अहसास। अब तक तो वह कसाई मुझे आराम से भंभोड़ना चालू कर दिया था। मेरे सीने के उभारों को मसलने लगा, दबाने लगा ओह, और मेरी गांड़ को चोद चोद कर मुझे दूसरी ही दुनिया में पहुंचा दिया।

अजीब अजीब शब्दों के साथ अपने उद्गार प्रकट करता रहा, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह मेरी जान, आह्ह्ह्ह मेरे प्यारे चिकनी गांड़ वाले गांडू, मस्त गांड़ है रे हरामी, तेरी तरह गांड़ जिंदगी में नहीं चोदा मेरी रंडी कुतिया, उफ़ उफ़ आह आह।” करीब बीस मिनट तक मुझे बुरी तरह चोदा और फिर जब खलास होने का समय आया तो मुझे इतनी जोर से जकड़ लिया कि ऐसा लगा मानो मेरी सांस ही रुक जाएगी। करीब एक मिनट तक मेरी गांड़ में अपना वीर्य फचफचा के डालता रहा फिर किसी भैंसे की डकारते हुए मुझे लिए दिए लुढ़क गया। मैं चकित था कि शुरू शुरू में इतना भयानक दर्द अंत अंत में कैसे छूमंतर हो गया मुझे पता ही नहीं चला। उनका लंड करीब करीब साढ़े छः इंच लम्बा था, जिससे पहली ही बार में चुदने में सक्षम हो गया था।

“ओह बेटा मजा आ गया। बहुत सुन्दर गांड़ है रे तेरा। तुझे मजा आया ना?” उसने कहा।

“ओह अंकल” मैं शरमा गया और उनके काले कलूटे तोंदियल शरीर से लिपट कर उनके सीने पर सिर रख कर सिर्फ इतना ही बोल पाया, “हां अंकल”।

“आज से मैं तुम्हें अपनी रानी बना कर रखूंगा मेरी जान। आज से पहले तेरे जैसा इतना सुंदर और मस्त लौंडा मुझे कभी नहीं मिला। कल से तू भी इस होटल का मालिक है। तुझे जो चाहिए बोल देना मेरी छमिया, तेरे कदमों में लाकर डाल दूंगा। अब से तू मेरी रानी और मैं तेरा राजा। मुझे छोड़ कर कहीं और जाने की सोचना भी मत मेरी जान। मुझे तुमसे प्यार हो गया है मेरे लंड की रानी।” वह भावनाओं में बहकर बोला और मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में लेकर मेरे होंठों पर अपने मोटे-मोटे होंठों को रख कर भरपूर चुम्बन दिया। इधर मैं सोच रहा था कि हर्ज ही क्या है यहां इनके साथ रहने में। मुझे रानी बना कर रखेगा, मेरी सारी सुख सुविधा का ख्याल रखेगा, आराम ही आराम, राज ही राज। जिस मासूमियत और इमानदारी से उसने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया, मैं उसका कायल हो गया। मैं उनके कुरूप चेहरे की सारी कुरूपता भूल कर उनके होंठों पर अपने होंठों को चिपका दिया और उनके प्रेमरस में सराबोर होता रहा।

फिर मैं किसी लौंडिया की तरह शरमाते हुए उनके नंगे शरीर से चपके चिपके बोला, “मैं कहां जाऊंगा भला आपके जैसे प्यारे प्यारे महबूब को छोड़कर। आज आपने मुझे एक नये सुख से परिचित कराया। नयी दुनिया का दर्शन कराया। मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला हूं। आज से आप मेरे राजा हो और मैं आप का वही हूं, जिस भी संबोधन से मुझे पुकारिए, रानी, प्यारी, चिकना, लौंडा या कुछ भी।” मैं भी भावनाओं में बहकर कच्ची उम्र की नादानी में बोल उठा। फिर उसी सुखद अहसास के साथ एक दूसरे के नंगे तन से लिपटे नींद की आगोश में चले गए।

इसके आगे की घटना मैं अगली कड़ी में ले कर आऊंगी। तब तक के लिए अपनी कामुक रजनी को आज्ञा दीजिए।

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।